प्रश्न- आपका धर्म क्या है ?
उत्तर - मैं धर्म में विश्वास नहीं करता हूं, क्योंकि धर्म ने मानव जाति को अत्यन्त कठोर वर्गो में विभक्त कर दिया है l धर्म ने ही मनुष्य को मनुष्य को मनुष्यता से वंचित कर दिया है l धर्म के ही चलते मनुष्यता कुंठित हो रही है l इसलिए मैं किसी एक धर्म की विचारधारा अपनाने का प्रबल विरोध करता हूंl
प्रश्न- किसी धर्म या ऐसी किसी स्थिति का अनुसरण क्यों किया जाय ?
उत्तर - किसी धर्म का अनुसरण नहीं करना चाहिए l इसके स्थान पर मनुष्य को उन सज्जन पुरूषों, आदरणीय पुरूषों, प्रतिष्ठित एवं निश्चल पुरूषों के आदेशों का पालन करना चाहिए, जिनका कोई धर्म नहीं है l
प्रश्न - गुरू क्या है ?
उत्तर - गुरू तुम्हारा मित्र हो सकता है, तुम्हारा सहायक या सेवक भी हो सकता है l जो व्यक्ति तुम्हें प्रभावित करता हो, जिससे तुम्हें वार्तालाप करना प्रिय लगे, जिसकी बातों को सुनने की तुम्हारे भीतर ललक हो, ऐसे व्यक्ति को पहचान लेना, तुम्हारे उपर निर्भर है l गुरू भगवान नहीं होता, मनुष्य भी नहीं l वह भगवान और मनुष्य के बीच में है l वह "हां" और "ना" के बीच में है l मेरे मित्र, गुरू की व्याख्या नहीं की जा सकती l वर्णन नहीं किया जा सकता l उसका तो अनुभव अथवा मनन किया जा सकता है l
प्रश्न- क्या ईश्वर का दर्शन कर पाना व अनुभव कर पाना सम्भव है l
उत्तर - ईश्वर शक्ति है l तुम उसका अनुभव कर सकते हो l उसका तत्वबोध प्राप्त कर सकते हो l ईश्वर कोई साकार मूर्ति नहीं है l वह प्राणतत्व है l तुम्हारी प्राणात्मा ही ईश्वर के आकार रूप में सम्मुख प्रकट होती है l
प्रश्न - अघोर धर्म क्या है ? तथा एक औघड़ क्या होता है ?
उत्तर - अघोर कोई धर्म नहीं है l यह एक मार्ग है जो मानवता का पथ प्रशस्त करता है l और औघड़ वही है जो शान्तप्रिय हो तथा उदार स्वभाव से सम्पन्न हो l औघड़ एक मानव है l वह सन्त नहीं होता, ईश्वर भी नहीं होता l
प्रश्न- जीवन का उदेश्य क्या है ?
उत्तर - जीवन का मुख्य उदेश्य अपने को जानना हैं तुम कौन हो ? क्या हो ? तुम इस दुनिया में क्यों आये हो ? तथा तुम्हारा कर्तव्य क्या है ? तुम यदि अपने आपको नही जानते तो तुम्हारा जीवन भृतक तुल्य है l
प्रश्न- इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति का आचार- विचार कैसा होना चाहिए ?
उतर - इसमें आचार-विचार से सम्बन्धित कोई कठोर नियम या प्रतिबन्ध नहीं है l इसमें सर्वोत्तम जीवन व्यापार यही है l कि उस महापुरूष की निकटता प्राप्त करो जो जीवन का रहस्य जानता है l ऐसे महापुरूष को पहचानना तुम्हारा काम है l
प्रश्न - यह भारत देश कुछ काल क्रम से विश्व के निर्धनतम देशों में कैसे आ गया ?
उत्तर - सुमित्र ! वे दिन बीत गये l हम दुनिया को यह दिखाने लायक हो गये हैं कि आज भारतवर्ष वह नहीं रहा जो बीस या तीस वर्षो पहले था l तुम उन लोगों से कह सकते हो कि भारत ही समस्त संसार का नेतूत्व करेगा, तथा कुछ ही वर्षो में दरिद्र राष्ट्र कहलाने की कलंक से छूट जायेगा l मैं तुम्हें सटीक समय तो नहीं बता सकता किन्तु वह स्थिति तुम्हारे जीवन काल में ही आ जाने वाली है lमुझे ऐसा कहने में अत्यन्त गर्व3 है l चमत्कारों के जरिए हम ऐसा कुछ करने नहीं जा रहे है l हम कठिन परिश्रम द्वारा बुद्धिमत्तापूर्ण योजनाओं से तथा यदि भगवान है तो फिर उनके माध्यम से भी करने वाले हैं l हम देखेंगे कि वह संकल्प सिद्ध हुआ है और यह कार्य सम्पन्न होकर ही रहेगा l
· साधु को भक्ति भाव से क्या मतलब l
· योगी को जीवन भर योगानाना पड़ता है l
· सभी साधु सबके लिए नहीं होते है, नसभी स्थान सबके लिए हो सकते हैं l
· बाहरी व्यवहार से साधु नहीं जाना जा सकता l
· साधु के लिए क्षमा ही अस्त्र है l
· मानवता ज्ञानी का लक्षण है l
· महापुरूषों के वाक्य पर विश्वास करो, कहीं न कहीं उसमें सच्चाई रहती है l
· साधु से जाँत-पांत न पूछिये, पूछ लीजिए ज्ञान l
· साधक को भी देर खलती है उसके कई कारण हो सकते है, विचार करो l
· साधु के यहाँ लेने के लिए ही जाते हैं l
· लक्ष्य ही साधना है लक्ष्य पर सन्देह साधक की परेशानी है l
· साधक को 'होनी' भासती है l
· साधु बहुत कम हैं, जो है उनमें भी आदमी बहुत कम हैं l
· योगी एक एक्स-रे मशीन की तरह है जो आपका सूक्ष्मता से अध्ययन करता है l
· सारी विकृतियाँ शुभ एवं अशुभ अघोरी की छाया में निष्क्रिय बन कर बैठती हैं l
· अघोरी को देखो वह तन से कहीं और मन से कहीं और रहता है l
· निष्काम शिष्य गुरू से सब कुछ ले लेता है l
· स्थित प्रज्ञ मनुष्य को निश्चय ही देह का भान नहीं होता l
· जिस साधु-सज्जन का प्रचार उसकी क्षमता से कम होता है वह भाग्यशाली है l
· जो कुछ देकर प्रसन्न होता है उस समय उसकी प्रसन्नता में दैवीय शक्ति का प्रदर्शन होता है l
· औघड़ शिव स्वरूप होते हैं l इनकी वन्दना इसी रूप में होती रही है l फिर भी समाज में प्रवेश नहीं पा सके l कुछ लोग ही इनकी चमत्कारिक शक्तियों के कारण ही पूजते रहे हैं l
उत्तर - मैं धर्म में विश्वास नहीं करता हूं, क्योंकि धर्म ने मानव जाति को अत्यन्त कठोर वर्गो में विभक्त कर दिया है l धर्म ने ही मनुष्य को मनुष्य को मनुष्यता से वंचित कर दिया है l धर्म के ही चलते मनुष्यता कुंठित हो रही है l इसलिए मैं किसी एक धर्म की विचारधारा अपनाने का प्रबल विरोध करता हूंl
प्रश्न- किसी धर्म या ऐसी किसी स्थिति का अनुसरण क्यों किया जाय ?
उत्तर - किसी धर्म का अनुसरण नहीं करना चाहिए l इसके स्थान पर मनुष्य को उन सज्जन पुरूषों, आदरणीय पुरूषों, प्रतिष्ठित एवं निश्चल पुरूषों के आदेशों का पालन करना चाहिए, जिनका कोई धर्म नहीं है l
प्रश्न - गुरू क्या है ?
उत्तर - गुरू तुम्हारा मित्र हो सकता है, तुम्हारा सहायक या सेवक भी हो सकता है l जो व्यक्ति तुम्हें प्रभावित करता हो, जिससे तुम्हें वार्तालाप करना प्रिय लगे, जिसकी बातों को सुनने की तुम्हारे भीतर ललक हो, ऐसे व्यक्ति को पहचान लेना, तुम्हारे उपर निर्भर है l गुरू भगवान नहीं होता, मनुष्य भी नहीं l वह भगवान और मनुष्य के बीच में है l वह "हां" और "ना" के बीच में है l मेरे मित्र, गुरू की व्याख्या नहीं की जा सकती l वर्णन नहीं किया जा सकता l उसका तो अनुभव अथवा मनन किया जा सकता है l
प्रश्न- क्या ईश्वर का दर्शन कर पाना व अनुभव कर पाना सम्भव है l
उत्तर - ईश्वर शक्ति है l तुम उसका अनुभव कर सकते हो l उसका तत्वबोध प्राप्त कर सकते हो l ईश्वर कोई साकार मूर्ति नहीं है l वह प्राणतत्व है l तुम्हारी प्राणात्मा ही ईश्वर के आकार रूप में सम्मुख प्रकट होती है l
प्रश्न - अघोर धर्म क्या है ? तथा एक औघड़ क्या होता है ?
उत्तर - अघोर कोई धर्म नहीं है l यह एक मार्ग है जो मानवता का पथ प्रशस्त करता है l और औघड़ वही है जो शान्तप्रिय हो तथा उदार स्वभाव से सम्पन्न हो l औघड़ एक मानव है l वह सन्त नहीं होता, ईश्वर भी नहीं होता l
प्रश्न- जीवन का उदेश्य क्या है ?
उत्तर - जीवन का मुख्य उदेश्य अपने को जानना हैं तुम कौन हो ? क्या हो ? तुम इस दुनिया में क्यों आये हो ? तथा तुम्हारा कर्तव्य क्या है ? तुम यदि अपने आपको नही जानते तो तुम्हारा जीवन भृतक तुल्य है l
प्रश्न- इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति का आचार- विचार कैसा होना चाहिए ?
उतर - इसमें आचार-विचार से सम्बन्धित कोई कठोर नियम या प्रतिबन्ध नहीं है l इसमें सर्वोत्तम जीवन व्यापार यही है l कि उस महापुरूष की निकटता प्राप्त करो जो जीवन का रहस्य जानता है l ऐसे महापुरूष को पहचानना तुम्हारा काम है l
प्रश्न - यह भारत देश कुछ काल क्रम से विश्व के निर्धनतम देशों में कैसे आ गया ?
उत्तर - सुमित्र ! वे दिन बीत गये l हम दुनिया को यह दिखाने लायक हो गये हैं कि आज भारतवर्ष वह नहीं रहा जो बीस या तीस वर्षो पहले था l तुम उन लोगों से कह सकते हो कि भारत ही समस्त संसार का नेतूत्व करेगा, तथा कुछ ही वर्षो में दरिद्र राष्ट्र कहलाने की कलंक से छूट जायेगा l मैं तुम्हें सटीक समय तो नहीं बता सकता किन्तु वह स्थिति तुम्हारे जीवन काल में ही आ जाने वाली है lमुझे ऐसा कहने में अत्यन्त गर्व3 है l चमत्कारों के जरिए हम ऐसा कुछ करने नहीं जा रहे है l हम कठिन परिश्रम द्वारा बुद्धिमत्तापूर्ण योजनाओं से तथा यदि भगवान है तो फिर उनके माध्यम से भी करने वाले हैं l हम देखेंगे कि वह संकल्प सिद्ध हुआ है और यह कार्य सम्पन्न होकर ही रहेगा l
· साधु को भक्ति भाव से क्या मतलब l
· योगी को जीवन भर योगानाना पड़ता है l
· सभी साधु सबके लिए नहीं होते है, नसभी स्थान सबके लिए हो सकते हैं l
· बाहरी व्यवहार से साधु नहीं जाना जा सकता l
· साधु के लिए क्षमा ही अस्त्र है l
· मानवता ज्ञानी का लक्षण है l
· महापुरूषों के वाक्य पर विश्वास करो, कहीं न कहीं उसमें सच्चाई रहती है l
· साधु से जाँत-पांत न पूछिये, पूछ लीजिए ज्ञान l
· साधक को भी देर खलती है उसके कई कारण हो सकते है, विचार करो l
· साधु के यहाँ लेने के लिए ही जाते हैं l
· लक्ष्य ही साधना है लक्ष्य पर सन्देह साधक की परेशानी है l
· साधक को 'होनी' भासती है l
· साधु बहुत कम हैं, जो है उनमें भी आदमी बहुत कम हैं l
· योगी एक एक्स-रे मशीन की तरह है जो आपका सूक्ष्मता से अध्ययन करता है l
· सारी विकृतियाँ शुभ एवं अशुभ अघोरी की छाया में निष्क्रिय बन कर बैठती हैं l
· अघोरी को देखो वह तन से कहीं और मन से कहीं और रहता है l
· निष्काम शिष्य गुरू से सब कुछ ले लेता है l
· स्थित प्रज्ञ मनुष्य को निश्चय ही देह का भान नहीं होता l
· जिस साधु-सज्जन का प्रचार उसकी क्षमता से कम होता है वह भाग्यशाली है l
· जो कुछ देकर प्रसन्न होता है उस समय उसकी प्रसन्नता में दैवीय शक्ति का प्रदर्शन होता है l
· औघड़ शिव स्वरूप होते हैं l इनकी वन्दना इसी रूप में होती रही है l फिर भी समाज में प्रवेश नहीं पा सके l कुछ लोग ही इनकी चमत्कारिक शक्तियों के कारण ही पूजते रहे हैं l
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