खेत-खलिहान से बढ़कर तपस्थली मैं अन्यत्र कही नही देखता l उस तपोभूमि में जो तप-रत है, उसे गृहस्थ (कृषक) कहते है l गृहस्थ का अर्थ है, वह व्यक्ति जो गिरि (पहाड़) को हस्थ (हाथ) पर उठाये हुए है lगृहस्थ की साधना है प्राणियों के प्राण में अन्न की आहूति दिलाना l देखो कितनी शक्तिशाली है यह साधना, कितना सौन्दर्य निहित है इस साधना के साधक के चित्त में l वह बुभुक्षा, क्लेश, क्लान्ति और चिन्ता रूपी अन्धकार को दुर्गम स्थान तक मार भगाता है llगृहस्थ का अपने हाथों पर गिरि उठाये रहना, रावण और कृष्ण द्धारा पहाड़ उठाये जाने से बिल्कुल ही भिन्न है l रावण और कृष्ण ने, कभी किसी एक दिन गिरि उठाया होगा किन्तु गृहस्थ तो सदैव, अपने हाथोंपर पहाड़ उठाये चलता रहता है l इन सद्गृहस्थों के द्धार पर अभ्यागतों या भाग्यवानों के पहुचने पर स्वागत-सत्कार की जो परम्परा है, उसका उल्लेख ऐतिहासिक ग्रन्थों में भी किया गया है l शास्त्रों में पंचवलियों का विधान हैl इन पाँचों बलियों में अतिथि बलि का बहुत ही महत्व है l
अतिथि या अभ्यागत का एक ही अर्थ है l अतिथि यानी अभ्यागत शब्द का व्यवहार इसी अर्थ में किया गया है l अभ्यागत का अर्थ है -- अभय के साथ गति दो l' आप किसी को अन्न-जल प्रदान कर उसके मन, प्राण और शरीर को गति देते है जिससे वह अन्न-जल ग्रहण करने के पूर्व की उदासीनता, दुर्बलता और मनोमालिन्य तथा उनसे उत्पन्न निष्क्रियता का त्याग कर, क्त्रियाशील और गतिशील हो उठता है और दूसरों के लिये भी त्र्कियाशीलता का प्रेरणा-श्रोत बन जाता है l
तुमनें तो निष्त्रिय लोगों का जीवन देखा है जो नैतिक मूल्यों को भी नही चुकाते है l वे अनैतिकता के पात्र से जान पड़ते है l जो क्त्रियाशील है उनमें गति तो है ही ; वे दूसरों को भी गतिशील बनाते है l वे समाज और राष्ट्र के नागरिकों को भी गति की ओर प्रेरित करते है l क्या इस तप को तुम सामान्य समझोगे ? यह हमारे महान ऋषियों के द्रष्टावेद का रहस्य है, रे l इस क्रियाशीलता, गतिशीलता, के अभाव में आज तुम निष्त्रिय जनों को परमुखापेक्षी देखते हो l उन्हें तुम 'ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे, के समक्ष मुहताज बने हुए पावोगे l उस वाया पक्षी को देख रहे हो न ? उसने अपनी कर्मठता से कितने सुन्दर और आकर्षक गृह का निर्माण किया है, जो उसे तथा उनके बच्चों को सर्दी, गर्मी और बरसात में सुरक्षा प्रदान करता है l वह अपने स्वरचित गृह की स्वामिनी भी होती है स्पष्ट है कि 'वाया; पक्षी सर्वोत्कृष्ट कोटि की कर्मठता. सक्त्रियता और कर्मशीलता की द्धोतक है l
मैं उन निष्किय बन्दरों के बारे में ऐसा नही कह रहा हूं जो दूसरों के आश्रय पर अपना जीवन-यापन करते है l फलतः वे निराश्रय रहते हैं l वे गर्मी के ताप से नहीं बच सकते, मैं उन निष्किय बन्दरों के बारे में ऐसा नही कह रहा हूं जो दूसरों के आश्रय पर अपना जीवन-यापन करते है l फलतः वे निराश्रय रहते हैं l वे गर्मी के ताप से नहीं बच सकते,शीत से नही बच पाते है , वर्षा से भी नहीं बच पाते है l परिणाम स्पष्ट है l वे इन सभी क्लेशों के भाजन बने रहते है l फिर भी, वे निर्लज्ज नही हैं l र्शर्म ने उन्हें प्रभावित किया है, यह तो तुमने देखा है l तुम्हें देखकर बैठा हुआ बन्दर, अपनी आंखें बन्द कर लेता है, और बन्द किये रहता है, यह भावना कर कि उसको कोई देख नहीं रहा है l यह लज्जा का ही द्धोतक है l अरे ! ध्यानमग्न साधु ! तुम्हारा ध्यान वह नहीं करेगा जो सक्त्रिय है, कर्मशील है l निष्किय के ध्यान में निमग्न तुम, स्वयं निष्कियता के मूर्तरूप दीखते हो l तुम्हारे गालों के गड्ढे निष्कियता के ही प्रतीक है l
ऐसे ही वहुतेरे प्राणियों, विशेषतया उन छिद्रान्वेषी नेताओं को देखो, वे कैसे जल रहे हैं ? उनके निकट जाने वाले को कितना तीव्र ताप सता रहा है l हाँ, सभी नेता ऐसे नही है l कुछ, जो नैतिकता के पूरक है, महान आश्रय दाता है l वे अपना सब कुछ देकर भी काटों से भरी हुई कुर्सी की कामना नही करते l वे अपनी वर्षा से भींगी, चूती हुई, झोपड़ी में, टूटी खाट पर स्वर्ग-तुल्य सुख से सोते हैं, सुख से उठते है, सुख से बैठते है, सुख से दूसरों से मिलते-जुलते है और सुख से अपना और दूसरों का उपकार करते है l वे अपने कार्यो-सेवाओ के लिए प्रत्युपकार की अपेक्षा नही रखते, पारितोषिक नहीं चाहते l
तुमने सुना है न कि यह किवदन्ती है कि दिल्ली का नाम आज-कल बदलकर बकलोलपुर हो गया है l उच्च पदस्थ एवं शीर्षस्थ लोगों के ओज रहित वाक्यों को बकलोल कहते है और जहां वे निवास करते है , उसे पुर कहते हैं lवनभकोल के सरीखे, भय उत्पन्न करने वालेb (जंगल का कानून देनेवाले ), निर्भय कैसे रह सकते है ? जो एक-दूसरे की आलोचना-प्रत्यालोचना को ही कर्त्तव्य मान बैठे हैं , वे तो सशकित और भयाक्रान्त रहेंगे ही l
बैठे से चलते रहना श्रयेस्कर nहै nl सोचो कि चलूगा, चल b दोगे l सभी तरह के मार्ग को पीछे ढकेल सकते हो ! हां, रे ! काल को भी ढकेल कर आगे बढ़ सकते हो !
· आज उच्च, मध्यम और निम्न स्तरों के सरकारी पदाधिकारी वेतन के अतिरिक्त रिश्वत भी लेते हैं l यह पूछने पर कि जिस कार्य के लिए उन्हें नियुक्त किया गया है उसके लिए तो उन्हे सरकार से वेतन मिलता है, तो ऐसी स्थिति में वे रिश्वत क्यों लेने का प्रयत्न करते हैं ? उनका कहना है l ‘अरे भाई ! हम तो बाल-बच्चे वाले है l यदि रिश्वत न लें तो घर का खर्च कैसे चलेगा l आज से सैकड़ों बर्ष पूर्व हमारे गुरूजन न्यायालयों में झूठी गवाही नही देते थे l वे कहते थे कि 'हमारे बाल-बच्चे हैं, हम गलत बातें नही करेगे, क्योकि उसका दुष्प्रभाव बच्चो पर पड़ेगा l' इस वर्तमान की अनदेखी हम कैसे कर सकते हैं l अरे भाई, यदि कोई हमें मारता है, तो हम उसे न मारे किन्तु वाणी द्रारा तो उसे ऐसा करने से रोकने का प्रयास तो कर ही सकते है, क्योंकि हमारी वाणी तो बन्द नहीं हुई है l यदि हमारी यही स्थिति बनी रही, तो हमारा भविष्य अंधकारमय है l आज हमारे घर में, समाज में एक विकृति सी छाई हुई है l इतिहास-पुराणों के श्रृंखला-बद्ध वृतान्त तो यही जताते रहे है कि देश, काल और पात्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ही धर्म और विधि की व्याख्या करनी चाहिये, जाननी चाहिये l बहुत सी जातियों, बहुत से धर्मो और ईश्वर-प्राप्ति के बहुतेरे मार्गो को न तो अकारण कहा जा सकता है, न सकारण कहा जा सकता है l आदर्श को ताक पर धरकर चलते-फिरते लोगों को इन नगरों में देखा जा सकता है l अल्प विचार, अल्प ज्ञान के चलते ऐसा हो रहा है l जिस प्रकार नये-नये खाध्दृ पदार्थो का आगमन बाजारों में हो रहा है, ठीक उसी प्रकार से आजकल नई-नई जातियाँ और धर्म, अधर से उतरते हुए, पृथ्वी पर दीख रहे हैं और दिशा-हीन प्राणियों के बीच अपना तात्कालिक रंग और प्रभाव डाल रहे हैं l पुराण और इतिहास बतलाते है कि बहुत सी जातियाँ और धर्म इस देश से पाताल में चले गये l कहीं ऐसा न हो कि नवोदित धर्म और जातियों की भी यही गति हो l इसकी पूर्ण सम्भावना है l तुम जानते हो कि दूध मानव शरीर को पोषण तत्व प्रदान करता है, किन्तु यदि दूध से भरे कटोरे में एक बूँद भी किसी बाहरी पदार्थ का छींटा पड़ जाता है तो पूरा का पूरा दूध फट जाता है और शरीर के लिये हानिकारक हो जाता है l बहुत सी नई-नई जातियाँ और धर्मो के उद्भव और उनके बीच नई प्रथाओं के जन्म और प्रचलन का भी वर्तमान धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति पर विघटनात्मक प्रभाव पड़ना अवश्यम्भावी है l
नवीनतम वस्तु विचार इत्यादि, बुरा होने पर भी तत्काल आकर्षक और अच्छे ही लगते है किन्तु उनका स्थायी प्रभाव व्यक्ति और समाज के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकुल ही होता है l उनकी पूरी व्यवस्था में विकृति ही उत्पन्न होती है l पुराणों में तो कहा गया है कि मन्दिर के पुजारियों का स्पर्श किया हुआ अन्न-जल ग्रहण करना, अपने आप की प्रताड़ना से कम नही है l प्रसाद में स्वाद का भाव नही रखना चाहिए l जहाँ स्वाद की भावना हुवी-----वह प्रसाद नही रह जाता l
नये-नये अपरीक्षित आगन्तुक विचार, धर्म और आचार-विचार को, स्थायित्व नही प्रदान कर सकते l जैसे बारहों महीने बरसात नही होती, बारहों महीने शरद ऋतु नहीं होती, बारहों महीने बसन्त ऋतु नहीं होती और बारहों महीने ग्रीष्म ऋतु नही होती--- ठीक उसी प्रकार से सर्वकाल में, सर्वत्र, सभी के लिये समान स्थिति, एक रूपता, एक रसता----नहीं होती है l स्वीकारी हुई कुछ परिस्थितियों को छोड़ा भी जा सकता है l छोड़ा हुआ कभी-कभी स्वीकार भी हो जाता है l प्रपंच, सुपाच्य थोड़े होता है l जो सुपाच्य है, वही पाचन-शील होता है l

साधु संगत विवेक की उपज-स्थली है;
बोओ, काटो और खलिहान में लाकर रक्खो l इसे साधु संग, सत्संग, कहते हैं l तूने तो रामायण की यह कथा सुनी है जिसमें गरूड़ के मन में उत्पन्न संशय का वर्णन किया गया यूहै l गरूड़, विष्णु को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने और लाने के एक-मात्र वाहन है l उनको यह गरूर हो गया कि वे भगवान विष्णु के सहचर और एकमात्र वाहन हैं l उनके इस गर्व को चूर करने के निमित प्राणमयी महामाया ने उन्हें अपने नेमोह के चंगुल में धर दबोचा और उनके हृदय में विष्णु के अंश-स्वरूप राम के बारे में संशय उत्पन्न कर दिया l तूने तो सुना है कि इसके परिणामस्वरूप पक्षीराज गरूड़ को अपनी कुल---जाति से निम्नतर पक्षी, काक-भुषुण्डी, का शरणागत होना पड़ा l काक-भुषुण्डी ने गरूण़ को आदर-सम्मान दिया, किन्तु साथ ही, उन्हें उनके हृदय में उत्पन्न हुए संशय को निर्मूल करने का आदेश दिया l काक-भुषुण्डी जी ने गरूड़ से कहा :---
‘ तबहीं होई सब संसय भंगा l
जब कछु काल करिअ सतसंगा ll’
संशय के दुष्परिणाम के सम्बन्ध में गीता में कहा गया है------'संशयात्मा विनश्यति' संशय-रूपी कलुष जिसके हृदय को एकबार कलुषित कर देता है, वह उस प्राणी के सदृश विवश एवं असहाय जीवन जीने को बाध्य हो जाता है जो निर्जन वन में अंध कूप में गिरकर, रक्षार्थ सहायता के लिए चिल्लाता-पुकारता रहता है, किन्तु कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आता l संशयजन्य दुःखों से विमुक्ति पाने के प्रयास अरण्य-क्त्न्दन के समान निरर्थक प्रमाणित होते हैं l
इसी दृष्टि से तुम उन अभीरों के संशयग्रस्त आचरण-व्यवहार के बारे में सोचो जिनका प्रभाव-क्षेत्र एक समय उत्तरी भारत से लेकर दक्षिणी भारत तक विस्तृत था l उतरी भारत में तो उनका बाहुल्य, आधिपत्य एवं प्रभुत्व दीर्घकाल से चला आ रहा था l स्वतंत्रता के पूर्व, दक्षिणी भारत के कर्नाटक राज्य में भी जिसकी राजधानी मैसूर थी, अभीरों का प्रबल प्रभाव और धाक थी l वे भैंस (महिष) रखते थे, चराते थे और उनका पालन-पोषण करते थे l महिषों के दूध-दही और घी की बिक्ती से प्राप्त आय ही उनकी जीविका का मुख्य साधन थी l इसी उध्दोग के पति थे उद्धोगपति l उनके पूर्व-पुरूष कुलीन स्त्रियों के प्रति दुश्शील आचरण करते थे l इसी आचरण को अपना आदर्श मानकर अभीरों ने जन-स्वीकृति प्राप्त करने के लिए इस पूरे क्षेत्र में उसके व्यापक प्रचार प्रसार के लिए, अपना सशक्त संगठन स्थापित किया और इस योजना के अंग स्वरूप कुलीनों का विकट परिहास प्रारम्भ किया l अपने अधिकार और सबल संगठन का स्वच्छन्द उपयोग कर अपनी आक्त्रामक गतिविधियों में, बल पूर्वक जन-स्वीकृति प्राप्त करना भी वे अपना धर्म मान बैठे थे l वे लोग अपनी इस परम्परा को आज भी ढो रहे हैं l उस समय कुलीन परिवार की ललनाओं के शील-भंग केकुत्सित सामूहिक प्रयत्न को अपना पितृधर्म समझ बैठे थे l उन्हें उनके धरों से बाहर निकाला जा रहा था l lदुर्गेश्वरी दुर्गा को उनके दुर्ग से बहिष्कृत किया गया l जब अभीरों का यह श्रृंखला-बद्ध, योजनाबद्ध, संघबद्ध उत्पात और दुस्साहस, पराकाष्ठा पर पहुँच गया, तो औघड़-अवधूतों ने दुर्गेश्वरी दुर्गा को सिहवाहिनी, महिषमर्दिनी की संज्ञा से सम्बोधित कर और उनके सिह को जागृति, बल और पौरूष का प्रतीक घोषित कर, लोगों को देवी के इसी रूप से प्रेरणा प्राप्तकर दुस्सह अभीरों के दुस्साहसिक एवं आक्त्रामक प्रयासों को विफल करने का आह्वान किया l इसके पूर्व देवी को, सिर्फ माया की द्योतक माना जाता था l तत्पश्चात दुर्गो यानी किलों से बाहर निकालकर, राजन्यवंश की गुण-शील सम्पन्न देवियों ने जन-सभायें आयोजित कर, लोगों को संगठित किया और आततायी अभीरों पर करारा मुँहतोड़ प्रत्याक्त्रमण कर, उन्हें पराजित किया l इसी के बाद इस पूरे क्षेत्र में सिहवाहिनी, महिषमर्दिनी के पूजन की प्रथा प्रचलित हुई l यही कारण है कि अभी भी बचे-खुचे अभीर, उत्तरी भारत के ग्रामों के वाह्य अंचलों में ही बहिष्कृत की नाई रहते है और गाय-भैस पाल-पोष कर अपना गुजर करते हैं l उच्छँखलता और उद्दृण्डता की अपनी परम्परा को अभी भी वे बनाये हुए है l
जिस समय भैसा या साँढ हमें मारने के लिये तत्पर होकर हमारा पीछा कर रहा हो, उस समय दुर्ग के दुर्गेश्वरी का स्मरण कर उन्हें दुर्ग से बुलाने के लिये दौड़ेगे, तो भैस या साँढ़ पकड़ कर तत्काल मार डालेगा l उस समय तो हम भैस या सांढ़ का नाश करने वाली, सिहवाहिनी-महिषमर्दनी से प्रेरणा प्राप्त कर, उन अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करेंगे जिनसें भैस या सांढ़ काटे जा सकते है; उनकी आँखें फोड़ी जा सकती हैं, उनके सींग और कान उखाड़े जा सकते है lतभी हम अभीरों का, जो भैस या सांढ़ के स्वामी हैं, सरदार हैं, और कुलीन नारियों का शील भंग करते हैं, नाश कर सकते है l
ऐसा ही सुनना, समझना और जानना होगा l प्राणमयी माता का पौरूष काव्य की रोचकता तक ही सीमित नहीं है l अंन्तरंग में छिपी हुई शक्ति ही, उनके पौरूष का मुख्य प्रतीक है l तू ही बतलाओ, यदि एक भैसा या साँढ़ तुझे मारने के लिए खदेड़ रहा हो तो तू अपने रक्षार्थ उस सिह या सिह वाहिनी को खोजने दौड़ोगे या जो भी हथियार, डंडा, ईंट-पत्थर, लोहा-लक्कड़ तुम्हारे हाथ तत्काल आयेगा उसी से तुम भैसा या साँढ़ से अपनी रक्षा करोगे ?'
दुष्प्रज्ञ जनों का संग, अकुलीनों का संग, दुखदायक है l मूर्खों का संग दुःख देता है l निम्न प्रवृत्ति और प्रकृति वाले प्राणियों का संग भी क्लेश और वेदना उत्पन्न करता है l
मैंने एक कथा सुनी है l एक हंस ने दुःख से संतप्त एक कौआ की सहायता की l जानते हो, कौआ अकुलीन, क्रृर और मूर्ख होता है l बाद में भी कौआ हंस द्दारा किये गये उपकार के लिए, उसके प्रति अपनी कृतज्ञता जताने के लिये, हंस से मिलता रहा l हंस-पत्नी ने हंस को परामर्श दिया---'कौआ की सहायता कर आप ने ठीक किया किन्तु वहीं तक रहने दीजिये l अब कौआ का संग न कीजिये l इसका दुष्परिणाम हो सकता है lहंस ने अपनी पत्नी की बात अनसुनी कर दी l वह कौवे के अनुनय-विनय पर जिस वृक्ष पर कौवे का नीड़ (निवास-स्थान) था वहाँ गया l
वे दोनों कुल, शील और वर्ण में भी भिन्न थे l हंस इस बात को जानता था किन्तु जब बुद्धि मारी जाती है तो ऐसा ही होता है l वृक्ष की डाल पर अपनी नीड़ में बैठे हुए कौआ ने उसके ठीक नीचे जमीन पर बैठे एक मनुष्य के सिर पर वीट कर दी और तत्पश्चात हंस को उसी डाल पर वहीं छोड़कर स्वयं दूसरी डाल पर जा बैठा l हंस बेचारा उसी डाल पर बैठा रहा l जिस व्यक्ति के सिर पर कौवे की बीट गिरी थी उसने उसी डाल के उसी स्थान पर छर्रा चला दिया जहाँ से कौआ ने बीट की थी और हंस बैठा हुआ था l छर्रा से हंस घायल हो गया और लड़खड़ा कर नीचे गिर पड़ा l उसकी मृत्यु तो नहीं हुई किन्तु छर्रे की चोट से वह बुरी तरह वेदनाग्रस्त रहा l
उधर कौआ हंस को वहीं घायल छोड़कर अन्यत्र भाग गया l घटना की सूचना मिलने पर हंसिनी घटना-स्थल पर पहुची l हंस की स्थिति देख कर उसने हंस से कहा---'मै बार-बार आपसे निवेदन करती रही कि अज्ञात कुल-शील वाले प्राणी का संग हानिकारक होता है, वह संगति करने योग्य नहीं होता, वह मित्र बनाने योग्य नहीं होता, किन्तु आप ने हमारी बातें नहीं मानीं l आज उसी का यह दुष्परिणाम है कि वह धूर्त तो अपनी चतुराई दिखा कर, आप को इस अवस्था में लाकर और असहाय छोड़कर, स्वयं बेदाग निकल भागा l'
मूर्खों और धूर्तों के संग के बड़े ही भयावह परिणाम होते हैं l अकुलीनों का संग भी समानरूप से हानिकारक होता है l अतः इनका संग----इनसे मैत्री, कभी भी, किसी भी परिस्थिति में, नहीं करनी चाहिये l इनकी सहायता भी नहीं करनी चाहिये l इनसे वार्तालाप भी नहीं करना चाहिए l
गंदे प्राणियों का संग और गन्दगी का साहचर्य बदबू देता ही है l यह निश्चित है l आज ही की घटना है, एक व्यक्ति को मैं बहुत दिनों से जानता था l वह अपायगामी व्यक्तियों की संगति में रहता था l वह अपने ग्राम के ही निवासी एक दूसरे व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता था और उसे अपमानित करने की चेष्टा बराबर ही करता रहता था l प्रतिक्त्रिया स्वरूप यह दूसरा व्यक्ति भी, प्रथम व्यक्ति से प्रतिशोध लेने के लिए षड्यन्त्र में संलग्न रहता था l अवांछनीय तत्वों के साथ ने उस व्यक्ति को इतनी विषम और निर्मम परिस्थितियों में लाकर खड़ा कर दिया कि गोली लगने से उसके प्रिय सहोदर भाई की सरजमीन पर ही मृत्यु हो गई और स्वयं हाथ-पैर तुड़वा कर और गोली से क्षत-विक्षत होकर अस्पताल में भर्ती हुआ है l अनैतिक, नीच, लोगों के बहकावे में आकर और उनके उकसाने पर, उनके बीच वाह-वाही पाने के निमित्त, उसे इस निष्ठुर कर्म का भागी और भोगी होना पड़ा है l
'कुलीन विचारवान होते हैं, संग-योग्य होते हैं l'
बोओ, काटो और खलिहान में लाकर रक्खो l इसे साधु संग, सत्संग, कहते हैं l तूने तो रामायण की यह कथा सुनी है जिसमें गरूड़ के मन में उत्पन्न संशय का वर्णन किया गया यूहै l गरूड़, विष्णु को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने और लाने के एक-मात्र वाहन है l उनको यह गरूर हो गया कि वे भगवान विष्णु के सहचर और एकमात्र वाहन हैं l उनके इस गर्व को चूर करने के निमित प्राणमयी महामाया ने उन्हें अपने नेमोह के चंगुल में धर दबोचा और उनके हृदय में विष्णु के अंश-स्वरूप राम के बारे में संशय उत्पन्न कर दिया l तूने तो सुना है कि इसके परिणामस्वरूप पक्षीराज गरूड़ को अपनी कुल---जाति से निम्नतर पक्षी, काक-भुषुण्डी, का शरणागत होना पड़ा l काक-भुषुण्डी ने गरूण़ को आदर-सम्मान दिया, किन्तु साथ ही, उन्हें उनके हृदय में उत्पन्न हुए संशय को निर्मूल करने का आदेश दिया l काक-भुषुण्डी जी ने गरूड़ से कहा :---
‘ तबहीं होई सब संसय भंगा l
जब कछु काल करिअ सतसंगा ll’
संशय के दुष्परिणाम के सम्बन्ध में गीता में कहा गया है------'संशयात्मा विनश्यति' संशय-रूपी कलुष जिसके हृदय को एकबार कलुषित कर देता है, वह उस प्राणी के सदृश विवश एवं असहाय जीवन जीने को बाध्य हो जाता है जो निर्जन वन में अंध कूप में गिरकर, रक्षार्थ सहायता के लिए चिल्लाता-पुकारता रहता है, किन्तु कोई उसकी सहायता के लिए नहीं आता l संशयजन्य दुःखों से विमुक्ति पाने के प्रयास अरण्य-क्त्न्दन के समान निरर्थक प्रमाणित होते हैं l
इसी दृष्टि से तुम उन अभीरों के संशयग्रस्त आचरण-व्यवहार के बारे में सोचो जिनका प्रभाव-क्षेत्र एक समय उत्तरी भारत से लेकर दक्षिणी भारत तक विस्तृत था l उतरी भारत में तो उनका बाहुल्य, आधिपत्य एवं प्रभुत्व दीर्घकाल से चला आ रहा था l स्वतंत्रता के पूर्व, दक्षिणी भारत के कर्नाटक राज्य में भी जिसकी राजधानी मैसूर थी, अभीरों का प्रबल प्रभाव और धाक थी l वे भैंस (महिष) रखते थे, चराते थे और उनका पालन-पोषण करते थे l महिषों के दूध-दही और घी की बिक्ती से प्राप्त आय ही उनकी जीविका का मुख्य साधन थी l इसी उध्दोग के पति थे उद्धोगपति l उनके पूर्व-पुरूष कुलीन स्त्रियों के प्रति दुश्शील आचरण करते थे l इसी आचरण को अपना आदर्श मानकर अभीरों ने जन-स्वीकृति प्राप्त करने के लिए इस पूरे क्षेत्र में उसके व्यापक प्रचार प्रसार के लिए, अपना सशक्त संगठन स्थापित किया और इस योजना के अंग स्वरूप कुलीनों का विकट परिहास प्रारम्भ किया l अपने अधिकार और सबल संगठन का स्वच्छन्द उपयोग कर अपनी आक्त्रामक गतिविधियों में, बल पूर्वक जन-स्वीकृति प्राप्त करना भी वे अपना धर्म मान बैठे थे l वे लोग अपनी इस परम्परा को आज भी ढो रहे हैं l उस समय कुलीन परिवार की ललनाओं के शील-भंग केकुत्सित सामूहिक प्रयत्न को अपना पितृधर्म समझ बैठे थे l उन्हें उनके धरों से बाहर निकाला जा रहा था l lदुर्गेश्वरी दुर्गा को उनके दुर्ग से बहिष्कृत किया गया l जब अभीरों का यह श्रृंखला-बद्ध, योजनाबद्ध, संघबद्ध उत्पात और दुस्साहस, पराकाष्ठा पर पहुँच गया, तो औघड़-अवधूतों ने दुर्गेश्वरी दुर्गा को सिहवाहिनी, महिषमर्दिनी की संज्ञा से सम्बोधित कर और उनके सिह को जागृति, बल और पौरूष का प्रतीक घोषित कर, लोगों को देवी के इसी रूप से प्रेरणा प्राप्तकर दुस्सह अभीरों के दुस्साहसिक एवं आक्त्रामक प्रयासों को विफल करने का आह्वान किया l इसके पूर्व देवी को, सिर्फ माया की द्योतक माना जाता था l तत्पश्चात दुर्गो यानी किलों से बाहर निकालकर, राजन्यवंश की गुण-शील सम्पन्न देवियों ने जन-सभायें आयोजित कर, लोगों को संगठित किया और आततायी अभीरों पर करारा मुँहतोड़ प्रत्याक्त्रमण कर, उन्हें पराजित किया l इसी के बाद इस पूरे क्षेत्र में सिहवाहिनी, महिषमर्दिनी के पूजन की प्रथा प्रचलित हुई l यही कारण है कि अभी भी बचे-खुचे अभीर, उत्तरी भारत के ग्रामों के वाह्य अंचलों में ही बहिष्कृत की नाई रहते है और गाय-भैस पाल-पोष कर अपना गुजर करते हैं l उच्छँखलता और उद्दृण्डता की अपनी परम्परा को अभी भी वे बनाये हुए है l
जिस समय भैसा या साँढ हमें मारने के लिये तत्पर होकर हमारा पीछा कर रहा हो, उस समय दुर्ग के दुर्गेश्वरी का स्मरण कर उन्हें दुर्ग से बुलाने के लिये दौड़ेगे, तो भैस या साँढ़ पकड़ कर तत्काल मार डालेगा l उस समय तो हम भैस या सांढ़ का नाश करने वाली, सिहवाहिनी-महिषमर्दनी से प्रेरणा प्राप्त कर, उन अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करेंगे जिनसें भैस या सांढ़ काटे जा सकते है; उनकी आँखें फोड़ी जा सकती हैं, उनके सींग और कान उखाड़े जा सकते है lतभी हम अभीरों का, जो भैस या सांढ़ के स्वामी हैं, सरदार हैं, और कुलीन नारियों का शील भंग करते हैं, नाश कर सकते है l
ऐसा ही सुनना, समझना और जानना होगा l प्राणमयी माता का पौरूष काव्य की रोचकता तक ही सीमित नहीं है l अंन्तरंग में छिपी हुई शक्ति ही, उनके पौरूष का मुख्य प्रतीक है l तू ही बतलाओ, यदि एक भैसा या साँढ़ तुझे मारने के लिए खदेड़ रहा हो तो तू अपने रक्षार्थ उस सिह या सिह वाहिनी को खोजने दौड़ोगे या जो भी हथियार, डंडा, ईंट-पत्थर, लोहा-लक्कड़ तुम्हारे हाथ तत्काल आयेगा उसी से तुम भैसा या साँढ़ से अपनी रक्षा करोगे ?'
दुष्प्रज्ञ जनों का संग, अकुलीनों का संग, दुखदायक है l मूर्खों का संग दुःख देता है l निम्न प्रवृत्ति और प्रकृति वाले प्राणियों का संग भी क्लेश और वेदना उत्पन्न करता है l
मैंने एक कथा सुनी है l एक हंस ने दुःख से संतप्त एक कौआ की सहायता की l जानते हो, कौआ अकुलीन, क्रृर और मूर्ख होता है l बाद में भी कौआ हंस द्दारा किये गये उपकार के लिए, उसके प्रति अपनी कृतज्ञता जताने के लिये, हंस से मिलता रहा l हंस-पत्नी ने हंस को परामर्श दिया---'कौआ की सहायता कर आप ने ठीक किया किन्तु वहीं तक रहने दीजिये l अब कौआ का संग न कीजिये l इसका दुष्परिणाम हो सकता है lहंस ने अपनी पत्नी की बात अनसुनी कर दी l वह कौवे के अनुनय-विनय पर जिस वृक्ष पर कौवे का नीड़ (निवास-स्थान) था वहाँ गया l
वे दोनों कुल, शील और वर्ण में भी भिन्न थे l हंस इस बात को जानता था किन्तु जब बुद्धि मारी जाती है तो ऐसा ही होता है l वृक्ष की डाल पर अपनी नीड़ में बैठे हुए कौआ ने उसके ठीक नीचे जमीन पर बैठे एक मनुष्य के सिर पर वीट कर दी और तत्पश्चात हंस को उसी डाल पर वहीं छोड़कर स्वयं दूसरी डाल पर जा बैठा l हंस बेचारा उसी डाल पर बैठा रहा l जिस व्यक्ति के सिर पर कौवे की बीट गिरी थी उसने उसी डाल के उसी स्थान पर छर्रा चला दिया जहाँ से कौआ ने बीट की थी और हंस बैठा हुआ था l छर्रा से हंस घायल हो गया और लड़खड़ा कर नीचे गिर पड़ा l उसकी मृत्यु तो नहीं हुई किन्तु छर्रे की चोट से वह बुरी तरह वेदनाग्रस्त रहा l
उधर कौआ हंस को वहीं घायल छोड़कर अन्यत्र भाग गया l घटना की सूचना मिलने पर हंसिनी घटना-स्थल पर पहुची l हंस की स्थिति देख कर उसने हंस से कहा---'मै बार-बार आपसे निवेदन करती रही कि अज्ञात कुल-शील वाले प्राणी का संग हानिकारक होता है, वह संगति करने योग्य नहीं होता, वह मित्र बनाने योग्य नहीं होता, किन्तु आप ने हमारी बातें नहीं मानीं l आज उसी का यह दुष्परिणाम है कि वह धूर्त तो अपनी चतुराई दिखा कर, आप को इस अवस्था में लाकर और असहाय छोड़कर, स्वयं बेदाग निकल भागा l'
मूर्खों और धूर्तों के संग के बड़े ही भयावह परिणाम होते हैं l अकुलीनों का संग भी समानरूप से हानिकारक होता है l अतः इनका संग----इनसे मैत्री, कभी भी, किसी भी परिस्थिति में, नहीं करनी चाहिये l इनकी सहायता भी नहीं करनी चाहिये l इनसे वार्तालाप भी नहीं करना चाहिए l
गंदे प्राणियों का संग और गन्दगी का साहचर्य बदबू देता ही है l यह निश्चित है l आज ही की घटना है, एक व्यक्ति को मैं बहुत दिनों से जानता था l वह अपायगामी व्यक्तियों की संगति में रहता था l वह अपने ग्राम के ही निवासी एक दूसरे व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता था और उसे अपमानित करने की चेष्टा बराबर ही करता रहता था l प्रतिक्त्रिया स्वरूप यह दूसरा व्यक्ति भी, प्रथम व्यक्ति से प्रतिशोध लेने के लिए षड्यन्त्र में संलग्न रहता था l अवांछनीय तत्वों के साथ ने उस व्यक्ति को इतनी विषम और निर्मम परिस्थितियों में लाकर खड़ा कर दिया कि गोली लगने से उसके प्रिय सहोदर भाई की सरजमीन पर ही मृत्यु हो गई और स्वयं हाथ-पैर तुड़वा कर और गोली से क्षत-विक्षत होकर अस्पताल में भर्ती हुआ है l अनैतिक, नीच, लोगों के बहकावे में आकर और उनके उकसाने पर, उनके बीच वाह-वाही पाने के निमित्त, उसे इस निष्ठुर कर्म का भागी और भोगी होना पड़ा है l
'कुलीन विचारवान होते हैं, संग-योग्य होते हैं l'
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