यदि महापुरूष समय और काल के अनुकूल विचार व्यक्त करता है तो वह शास्त्र, पुराण अथवा किसी भी धर्म के पवित्र ग्रन्थ से अधिक महत्त्व रखता है l जो देखने में नहीं आता है, अनुमान से ही जिस ईश्वर को देखा है, उस ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती l महापुरूषों ने जिन पुरातन ग्रन्थों की रचना की है, उनकी भाषा ईश्वरद्वारा प्रदत्त भाषा हो ही नहीं सकती l जिस काल में, जिस समय में हम हैं, यदि उसी काल और समय के अनुकूल शासक, वैद्ध, गुरू मार्गदर्शन करता है तो सच पूछिये तो सही माने में सिद्ध पुरूष है l इसीलिए जनश्रृति भी वर्तमान समय के महापुरूषों के विचारों को तत्काल अंगीकार करने में रूढ़िता को पीछे छोड़ देती है lजिस तालाब में पानी आने का रास्ता तो हो मगर निकलने का रास्ता न हो, तो वह रूका हुआ पानी स्वभावतः गन्दा हो जाता है l यदि उसमें पानी आने का रास्ता न हो तो उसमें कीचड़ हो सकता है, उदासीनता हो सकती है lयदि उसमें पानी आने का भी रास्ता हो और निकलने का भी रास्ता हो, तो वह अच्छे जीवन का मार्ग देता है lकोई भी संस्था चाहे राजनीतिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो, यदि मनुष्यों को, प्राणियों को, समय और काल की गति के साथ खुले आकाश और खुली वायु में बिना बोझ के जीना नहीं सिखाती और मानव जाति के लिए अच्छी प्रेरणा का स्त्रोत नहीं बनाती तो वह संस्था अपने-आप में बुझ जाती है, बिला-सी जाती है l उसमें न जाने कितनी विकृतियाँ आ जाती है l
हम बराबर समतल में जीना, रहना, चलना-फिरना चाहते हैं, न कि ऊबड़-खाबड़, गढ़े, नाले में डूबकर मरना चाहते हैं l हमें हरदम कुछ नवीनता चाहिए l वह नबीनतम चाहिए, जो आर्य सत्य को भी न भुला सके l आगन्तुक विचार-धाराओं को भी न अपना सके l
हमारे अपने-आप में जो वास्तविकता उत्पन्न होती है, वह सबके लिए भी कल्याणकारी और अपने लिए भी कल्याणकारी होती है l उसका प्रारम्भ भी कल्याणकारी और अन्त भी कल्याणकारी होता है l वह हमें जीवन का पथ-प्रदर्शन कराती है l
अघोर-दर्शन· स्पष्टवादी होना ही जरूरी नहीं है, स्पष्ट कार्य भी जरूरी है l
· बुरे की भी बुराई न करना मनुष्यता है l
· अपना विश्वास तथा आत्मबल ही सफलता की जड़ है l
· मनुष्य का कोई भी प्रयास विफल नहीं जाता, प्रयास लगन से करते रहना ही सफलता है l
· अपने सम्मान के प्रयास से घमंड या अभिमान पैदा होता है और आत्मा का प्रकाश क्षीण होने की सम्भावना बनी रहती है l
· बेकार रहने से बुद्धि तथा बल घटता है l
· एकान्तवास जीवन को उच्च तथा शान्तिप्रिय बनाने का सर्वश्रेष्ट उपाय है l
· ईश्वर पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नही है l ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष पर ही प्रसन्न नही होता और न कोई व्यक्ति विशेष ही उसका भक्त है l उस पर तो सबका अधिकार है l वह सब पर प्रसन्न होता है l सभी उसके भक्त हैं l पर ईश्वर से सम्बन्ध बनाने के लिये सबको अपनी आत्मा को स्वच्छ रखना परमावश्यक है l स्वच्छ आत्मा वाला ही परमात्मा को पाने का अधिकारी है l
· ईश्वर गृह-त्याग, तप तथा एकान्त में यातनायुक्त साधना, व्रत, योग इत्यादि रास्ते से ही नही प्राप्त होता l बल्कि गृहस्थ जीवन में रहकर भी बिना किसी साधना के प्राप्त होता है और वह एकमात्र साधना आत्मा की पवित्रता है l
· ब्रह्रा का न रूप है, न रंग l न इसका कोई आकार है न प्रकार l न यह दृश्य है न अदृश्य ही l यदि तुम्हें ब्रह्रा की खोज करनी है तो तुम रूप-रंग, आकार-प्रकार, दृश्य-अदृश्य से मुक्त होकर मन की ही सच्ची उपासना करो l तुम्हें निश्चय ही ब्रह्रा की अनुभूति होगी और तुम स्वयं ब्रह्रामय हो जाओगे l
· जो जीवन के रहस्य को बाहर और भीतर सब तरफ से जान जाता है, वह ईश्वर और ईश्वरत्वं .......दोनों को जान जाता है l
· जहाँ से बुद्धि अपनी थक जाती है, वहाँ उसी के बाद ही, ईश्वर को पाना सुगम हो जाता है l

दंभ, बनावट और विकृति का द्धोतक है l दंभी जीवन वास्तविकता से वंचित कर, दूसरों को ठगने की प्रवृतृति को प्रश्रय देता है l क्या अपने अभ्यन्तर की जटिलता को नख और जटा बढ़ाकर, खाक या लंगोटी लपेट कर और जटिल बना देना चाहते हो ? इसे सुलझाओ सोच कर देखोगे तो तुम्हें, अपने भी इसमें उलझना दंभ ही प्रतीत होगा l दूसरे लोगों की समझ में तो ऐसा है ही l यह विकृति का पूरक है l इसका आश्रय लेना, साधुता कभी भी नहीं हो सकती l यदि वेश, भेषज्ञ, नहीं हुआ, तो दंभ ही कहा जायगा l तुम जानते हो कि राम ने दंभ का तिरस्कार किया था l यह मनुष्य को अपने आप से बिल्कुल अपरिचित बना देता है l दंभ का संचय न कर l यह मूर्खता का आश्रय-स्थल होता है l ‘’
दंभ घमण्ड नहीं है l यह रंगुआ सियार जैसा स्वांग रचना मात्र है l यह अत्यन्त ही वीभत्स है l राधिका के आचरण पर जन-स्वीकृति की मुहर लगवाना, अपकीर्ति का जनक होना, असंयम का श्रोत बनना, विकृति की धरोहर होना l और मदन का पूजन करना---दंभ के सिवा और क्या हो सकता है ?
जो बनता है वह बिगड़ जाता है l तू बिल्कुल न बन l उस स्थिति में बिगड़ने का भय नहीं रहेगा l जैसा कि मैंने कुछ समय पूर्व तुम्हें बतलाया था, दंभ अपने आप से अपरिचित बना देता है l मै यह सुना हुआ नहीं कह रहा हूँ बल्कि यह सब कुछ मेरा देखा हुआ है lदंभ कपट का पोषक है, छल-छिद्र का आश्रय है, जहाँ आत्माराम कभी भी नहीं आते l तू कुछ न बन, सिर्फ मनुष्य बन जा l ब्राह्राण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बन कर विकृति का पोषक न बन l जन-स्वीकृति ने इसकी स्वीकृति नहीं दी है l आज की स्थिति कुछ और ही है,
तुम्हारी तरूणाई कितनी तेजी से पीछे छूटती जा रही है l तुम तीव्र गति से अपरिचित बुढ़ापे की और भागते चले जा रहे हो l दंभ का रथ त्याग कर, निश्चल रथ में जीवन-यात्रा करो ताकि तुम से कोई ठगा न जाय l जरा, तरूणाई और बुढ़ापा से परे हट कर हैl इसकी बिल्कुल संभावना नही है कि जरा की मैत्री हमें अपने आप में कुशल से रहने देगी, बल्कि इसकी संभावना है कि इसकी मैत्री के दुस्सह परिणाम, हमें मार डालेगें l यदि सच कहो तो मैं तुम से कुछ और कहूं l जो कुछ भी तू सूंघ रहा है, स्पर्श कर रहा है, वे घ्राण और त्वचा के विषय हो सकते हैं-----किन्तु ये सभी तेरे प्राण के विषय नहीं हो सकते l इस सत्य की अनदेखी कर, चक्षु, श्रवण, नासिका और त्वचा के विषयों को वास्तविक मान बैठना, अपरिचितता को गौरव देने सरीखे होगा l यह दंभ के अतिरिक्त और कुछ नही है l मन और मनन का विषय प्राणमयी परमेश्वरी नहीं है, यह अदृश्य है, देखा नही जाता l यह वाणी का विषय नहीं है, इसे कहा नहीं जाता l 'कणिका, कणिका, कणिका, कैसा, कैसा, कैसा ! ' सच तो यही है, l
इन्द्रियों के विषयों को विश्वसनीय मानना, कमजोरी----- विकृति के अवशेष को स्वीकार करना है, दंभ को आश्रय देना है l तुम ऐसा रहो, ऐसा करो, ऐसा चलो कि तुम से कोई ठगा न जाय, तुम्हें कोई नाम-रूप के बंधन में बांधे नहीं, तुम्हारी कोई सीमा तय न करे, तुम्हें किसी पदार्थ से न तौले l तुम असीम बनो, अतौल बनो l भले ही तुम्हें कोई ठग ले जाय, किन्तु तुम किसी को न ठगो l ऐसा ही बनो l
हर बनावट पर मचल जाने वाले मनचले लोगों को कोई क्षमा नहीं करता l ऐसे लोगों को अपने आप को अपने आप की ओर से भी क्षमा नहीं होती है l उन्हें निराशा, पस्त-हिम्मती और ग्लानि के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगता है lk मन में कितना आता है, कितना जाता है, कौन आता है, कौन जाता है, इन सभी को झाड़ बहारकर फेंक दो l बुढ़िया आजी की झाडू तुम्हें याद है न ? प्राण को ही अजन्मा, अच्युत, कहते हैं जो सदैव, सर्वकाल में, सर्वत्र पाया जाता है l किन्तु जो भूले हुए हैं, जो दंभी हैं, उनके लिऐ प्राण से मिलन दुर्लभ है l इसकी कतई सम्भावना नहीं है l दंभ ने बड़े-बड़े विद्वानों, पण्डितों, योगियों, साधुओं को भी वास्तविकता से अपरिचित बनाये रखा है l जन्म के आधार पर जाति-पाँति, छूआछूत, का पोषक दंभ ही है l
मै प्रायः देखता हूं कि लोग अपनी दुरवस्था के लिये विषम परिस्थितियों को ही उत्तरदायी ठहराते रहते हैं l अव प्रश्न यह है कि ये परिस्थितियाँ क्योंकर उत्पन्न होती हैं? मनुष्य अपनी दुर्बलता में मनुष्यत्व को ताक पर रखकर ऐसा कुकृत्य कर बैठता है कि वह स्वयं इन विषम परिस्थितियों का जनक बन जाता है l वह स्वयं इसका आवाहन करता है l विपत्ति और मौत, मानवकृत कुकूत्यों के ही परिणाम हो सकते हैं l अच्छे एवं आदर्श आचरण-व्यवहार से किसी प्रकार के अभाव का जन्म नहीं होता, विपत्ति नहीं आती l
गलत आचार-विचार और व्यवहार से मानव रोग-ग्रस्त होता है, शनैः शनैः उसका स्वास्थ्य खराब होने लगता है, वह बिस्तर पकड़ लेता है और अन्ततोगत्वा मौत सिरहाने आकर खड़ी हो जाती है l यह जनश्रृति का कथनहै कि मनुष्य खुद विपत्ति और मौत को आमंत्रण देता है l ऐसा वह अपरिचित परिस्थितियों के कारण नहीं करता है बल्कि परिचित परिस्थितियों में ही वह ऐसा करता है l तुम पूछ सकते हो, कैसे ? 1
मनुष्य जूआ के कुपरिणाम से भलीभांति अवगत होते हुए भी, युधिष्ठिर की जूआ खेलने वाली प्रवृत्ति को अपनाता है, इधर-उधर झगड़ा लगाकर मुकदमेबाजी की लत को प्रश्रय देता है, वेश्यागमन की आदत को प्रोत्साहन देता है l इन सभी दुराचरणों से अर्थ की क्षति तो होती ही है, स्वास्थ्य पर भी इनका कुप्रभाव पड़ता है lअर्थ की क्षति को पूरा करने के लिए ऋण का सहारा लेता है, जब ऋण मिलना वन्द हो जाता है तो ठगी, धोखाधड़ी का आश्रय ग्रहण करता है lजब यह मार्ग भी अवरूद्ध हो जाता है तो उसके सामने भीख मांगने की नोबत आ जाती है l स्वास्थ्य की खराबी से विपत्ति, जरा, मौत की चपेट में फंस जाता है l इसे मनुष्य द्धारा विपत्ति और मौत के आवाहन के सिवा और क्या कहा जा सकता है ?
जनश्रुति भी यही कहती है l शरीर में जो वज्ज्रवत धातु (वीर्य) है, वह स्वस्थ और दीर्घ आयु का जनक है, पोषक है l उसकी उपेक्षा का सहन शरीर नहीं कर सकताउसका अपव्यय, अनादर, होने से शरीर जर्जर, रोग-ग्रस्त हो जाता है l यह अपव्यय, यह निरादर, निश्चित रूप से विपत्ति का ही द्धोतक है l कोई कहे कि मैं असमर्थ हूँ, अनजान हूँ, नहीं जानता----तो ऐसे धैर्यहीन व्यक्ति का साथ धीरज भी नहीं देता l ऐसे व्यक्ति को लोग धिक्कारते हैं l उसे धरकार, बैतुल, भण्ड, दुश्शील, कहकर सम्बोधित करते हैं l
मैं यह नहीं कहता कि शास्त्र-पुराणों में प्रतिपादित पुराने विचारों को ही गौरव दिया जाय l मैं स्त्रियों से भी यह नही कहना चाहता कि वे राधिका के आचरण को आदर्श समझें l पुरूषों के लिए भी, मैं यह नहीं कहना चाहता हूँ कि वे कृष्ण की रासमण्डली की छाया को ही स्वीकार कर लें l मैं तो कहुंगा कि वे बरावर सतर्क रहें, चौकन्ने रहें l कहीं इन ललिताओं, बनिताओं,का निनाद,'तत् तत् थेई थेई' की थिरकन, उनका मोहिनी रूप (मोह नहीं) , नचा तो नही रहा है ? उनके मोहिनी-रूप के जादुई प्रभाव से सदैव सावधान रहें l मैने बच्चों की 'घिरनई' (घिरनी का खेल) देखा था l वह घृणित नहीं था l वह बच्चों के मनोरंजन का साधन था l तू कितने दिनों तक बच्चों का स्वभाव बनाये रखेगा ? उसका त्याग करो l
शब्दों के सही अर्थ को अनर्थ में मत परिवर्तित करो l मनुष्य योनि सबको सदैव नहीं सुलभ होती l मैने योगी जनों को भी कहते सुना है कि मानव-जीवन के लिए देवता भी तरसते रहते हैं l तुझे परिस्थितियों से बड़ा भय है क्या ?निर्भय बन नीरव बन भय का अवशेष भी निश्शेष हो जाए l परिस्थिति परायी की स्थिति को कहते हैं, अपरिचित स्थिति को कहते है l जहाँ परिचित स्थिति होगी, वहाँ अपने को अपरिचित-असहाय समझना, स्वयं को धोखा देने से कम थोड़े है l ऐसा ही समझना होगा l तब, सुने सरीखे नहीं, देखे सरीखे मालुम होगा l
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