Aughad Baba

Aughad Baba
आया मौज फकीर का, दिया पिटारा खोल ?
चारों कुतिया राम की, करें भजन में भंग l
इनको टुकड़ा देइ के; तब करो सत्संग ll
मन भागन तो भागन दे; तूँ मत भाग शरीर l
जो कमान ढीला रहै; कैसे छूटै तीर ll
बाबा बाबा सब कहै, माई कहै न कोय l
बाबा के दरबार में, माई करै सो होय ll
भजन तजन के बीच में, मैं करूँ विश्राम l
मेरी भजन राम करें, मैं करूँ आराम ll
सन्तों सन्तों सब एक हैं, जस पोस्ता के खेत l
कोई कुदरती लाल हैं, कोई सेत के सेत ll
घूमत - घामत जाइये, जहाँ जनम का ठांव l
खूँटा गाड़ पुजाइये, तब तो 'औघड़' नाम ll
'औरो घर' हैं औघड़ का, औघड़ - पीर, सूखी नदिया बहावे नीर l
खाली के भरे, भरल ढरकावे, और फिर, चाहे तो फिर भरै ll

वाणी, --

अघोरेश्वर वाणी, --
मनुष्य पहुँचने को सब जगह पहुँच सकता है l यदि उसका ठहराव नहीं है तो तू जानो वह कुकृत्य-काया है, कलुषित विचार वाला है l जो मनुष्य जहाँ पहुँचता है, देर से पहुँचता हो तो वह कलुषित विचार वाला है l यदि ठहराव, स्थिरता उसमें है तो वह सुकृत-काया है, पवित्र विचार वाला है, स्वच्छ दृष्टि वाला है, स्वच्छ इन्द्रिय वाला है, स्वच्छ मन वाला है l जो पृथ्वी को पृथ्वी सरीखे नहीं देखता है, वायु को वायु सरीखे नहीं देखता है, तेज को तेज सरीखे नहीं देखता है, जल को जल सरीखे नहीं देखता है, अपने प्राण का आश्रय स्थान देखता है, सही माने में वही देखता है l कहो, कैसे ? पृथ्वी पूर्वजों के आदर की पात्र रही है, हमारे मेधाओं का निवास स्थान रही है l जल इस शरीर का पोषण है, पृष्ट करने वाला है l वायु इस प्राण को सम्यक् तरह से वगैर कम्पन के स्थिरता प्रदान करने वाला है l तेज हमें दृष्टि देता है, मार्ग देता है l प्रकाश अपने आपकी दूरी कम करता है l जो ऐसे देखता है, वही देखने सरीखा है l मैं ऐसा ही इनको देखता हूँ l ऐसा ही देखने वाले को सहज समाधि वाला कहकर के सम्बोधन किया जाता है l
मेरे नाम के कारण अनेक क्रूर मनुष्य तुमसे बैर रख सकते है, क्योंकि उनके स्वार्थ पर आघात होने का डर समाया रहता है l समान मनुष्य, अच्छा मनुष्य, तुम्हारा स्वागत करेगा, स्नेह करेगा, प्यार करेगा l
संसार के बहुत से चतुर लेखकों की लेखनी, सुनिश्चित नहीं है कि वह आयु वाली होंगी l महापुरूषों कीकी अनुभूति को व्यक्त करने वाली लेखनी लम्बी आयु वाली होती है l जन-समूह की वह स्वीकृति प्राप्त की हुई होती है l अखबार, पत्र-पत्रिकाओं की तरह अल्पायु नहीं होती l
गुरू वाणी
· मनुष्य जीवन बेकार है l जब प्रसन्न न रहा l जल्द शरीर का नाश होनेका अर्थ जल्द छुटकारा l
· एकान्तवास चित्त शान्ति के लिए होता है पर बहुत देर तक एकान्त मे रहना तथा ध्यानमग्न रहना अभ्यास पर निर्भर है l
· इतना देखने पर भी मनुष्य अभिमान नही छोड़ता , अगर सिर्फ अभिमान दूर हो जाय तो मानव देव बन जाय l
· श्वांस जितना कम चलेगा उतना ही मनुष्य दुरूस्त रहेगा, आयु बढ़ेगी l
· जीवन बड़ा ही प्रपंचमय है कोई किसी का नहीं है l
· निष्काम कर्म, स्वच्छ विचार एवं स्पष्ट निर्णय के साथ इस जगत में शान्ति सम्भव है l
· सत्य वचन और सत्य कर्म जीवन को निर्भीक बनाते हैं l
· निर्भीक होने से जीवन को निश्चित गति मिलती है निश्चित गति सफलता की तरफ एक प्रशस्त मार्ग है l
· जिसमें एकाग्र होकर संचालन करने की क्षमता है वह बड़ी-बड़ी समस्याओं को चिन्तन द्वारा हल कर सकता है l
· हर मनुष्य को अपने ठीक होने का प्रयास करना चाहिए इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकता l
· इस छोटे से जीवन को यह याद कर कि जल्द ही जाना है, जाने वाले की तैयारी की तरह व्यतीत करना चाहिए l
· कम से कम दस मिनट रोज समय निकालकर एकाग्र चित्त बैठने की कोशिश करो l
· मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी बाहरी वातावरण से प्रभावित होना है, वह भी कुछ देर के लिए l अच्छे या बुरे दोनों प्रभाव क्षणभंगुर होते हैं l इसलिए एकान्तवासका महत्व है l

ईश्वर द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित प्राणमयी प्राणी की उपासना ही श्रेष्ठ

जड़ पदार्थ से चैतन्य की आशा करना व्यर्थ है l कहो, कैसे ? क्या तुम ईश्वर द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित प्राणी और मनुष्यों द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति के वीच की दूरी को जानते हो ?
सच्चे साधु ईश्वर द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित, प्राणमयी प्राणी की उपासना करते हैं l गुरू के सान्निध्य में रहकर जिन व्यक्तियों ने ज्ञानार्जन किया है और शुद्धाचरण का विकास किया है उनके द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियों की उपासना-आराधना ही फलवती होती है l जिन मनुष्यों में ऐसे ज्ञान और आचरण का अभाव है, उनके द्वारा मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा अर्थहीन है l ऐसी मूर्तियां, किसी भी अन्य जड़ पदार्थ से भिन्न और कुछ नहीं हैं l ऐसी जड़-मूर्तियों की पूजा कर, मनोवांछित फल की कामना, वैसी ही निरर्थक है जैसे आकाश के तारामंडल से हार बनाने की कामना l

Avadhoot Mangal Dhan Ram Baba

Avadhoot Mangal Dhan Ram Baba

Wednesday, December 2, 2009

फोटो गैलरी mangaldhanram

गुरू वाणी
· मानव जाति बहुत कुछ खो चुकी है l
· अन्धा दूसरे को अन्धा कैसे कहे l
· तुम्हारे साथ वाला भी तुम्हें अच्छी तरह से नहीं पहचानता l
· टेढे-मेढ़े आईना में तुम्हारा मुँह भी टेढ़ा दीखेगा l
· धार्मिक ग्रन्थों में अधिक आदर्श ही है l
· एक दूसरे जैसा कभी नहीं होता l
· आपके धर्मग्रन्थों में देवताओं का जैसा चित्रण है शर्मनाक है l
· यदि खर आग से जले तो दोष किसका l
· आयु में बड़ा होना ज्ञान में बड़ा होना नहीं है l
· प्यार से बल मिलता है l
· स्वास्थ लाभ की कामना से मनुष्य अस्वस्थ नहीं होता l
· मनुष्य अनजानते ही आ गया l
· धन मिलने से अच्छा है भले आदमी का मिलना l
· श्रम से गरीबी भागती है जब ईमान साथ देता है l
· पुराने लोगों से मिलने से सुख मिलता है l
· इस शरीर की कब क्या गति होगी कोई नहीं जानता l
· रक्षा तो बन्धन तोड़ने में है l
· तुम्हारे श्वांसों से ही गलत वायु प्रवेश करती है l
· प्यार भावना है, समर्पण नहीं l
· जो मांगते है वह ईश्वर से प्रेम नहीं करते हैं l
· भगवान से भी डरना बुरा है l
· गणतन्त्र दिवस भारतीयों का त्योहार नहीं बन सका l
· अध्ययन का कोई स्थान नहीं होता, वह तो मन में ही होता है l
· विचार और कर्म में अन्तर ही दुःख का कारण है l
· मनुष्य को चाहिये कि स्वस्थ रहते ही एकान्त जीवन व्यतीत करने की कला सीख ले l
· बुढापे में या अस्वस्थ होने पर कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा या अन्य कामों से फुरसत मिलने पर ही साथ देगा , वह भी कोई बुरा न कहे इसलिये l
· यादगारी की बातें नहीं होती काम होता है l
· इन्तजार भी एक तपस्या है l
· तुम जिसको जानते हो, क्या वह भी तुमको जानता है, चाहे भगवान ही क्यों न हो l
· कोई किसी का साथ नहीं देता, अपना सब कुछ मिटाकर ही साथ सम्भव है l
· क्या तुमने किसी पर विश्वास किया है अगर किया है तो क्या बदलाव आया या क्या स्थिरता आई l
· विचार के उतार-चढ़ाव का असर चेहरे पर होता है देखो l
· समय की दूरी असंतोष पैदा करती है पर धीरज उसे दूर करता है l
· लक्ष्य की प्राप्ति में चलने में सुख मिले तो लक्ष्य की प्राप्ति समझो l
· बगल के निवासी से सतर्क रहो, वह तुम्हारी कमजोरी जानने की कोशिश करता है l
· मारना है तो मरना सीखो l
· प्यार भी मौत का कारण बन सकती है और नफरत भी l
· अपने चेहरे को निहारो दुःख में भी सुख में भी सोचो lजिसने तुम्हें यहाँ लाया है वह तुम्हें देखता है, तुम भी उसे देखो, समझो l
· जो भारतीय देश के बाहर रहते हैं, उन्हें वहाँ घर में भारतीय चरित्र को बनाये रखना होगा l सुधार भय से नहीं स्वभाव से होना चाहिए l


· जिसमें गुणों की समता नहीं है, वह बाहर समता का व्यवहार कैसे दे सकता है l
· तुम जैसा देखते हो, संसार वैसा नहीं है l
· विज्ञान को तो समुद्र में उठने वाले तूफान का अध्ययन करना चाहिए l
· बढ़ता हुआ भय और अनर्थ तो अपनी अन्तर से मिलने जा रहे है l
· सोचो, क्या तुम अपने लिए परेशान हो या दुःखी मानवता के लिए l
· आत्मज्ञानी प्रकृति का संकेत समझता है l
· मन में उठने वाले प्रश्नके हल होने पर ज्ञान बढ़ता है l
· पार्वती तप की प्रतीक है l
· जब शिक्षा रोजगार परस्त होगी तब ज्ञान के लिए दीक्षा का महत्व बढ़ जावेगा l
· अपने साथियों को अच्छे कर्म के लिए प्रोत्साहित करो, इससे दुर्गुण कमजोर पड़ जावेंगे l
· सद् गुण सीखने से नहीं आते इसके लिए साथ करना होता है l
· मनुष्य बुरा नहीं पैदा होता, परिस्थिति एवं वातावरण जिम्मेदार होते है l
· मनुष्य में उसी का प्रकाश है, जरा स्वच्छ बन कर देखो l
· अगर तुम निष्क्रिय बनते हो तो वातावरण तथा परिस्थितियाँ भी साथ छोड़ देंगी l
· प्रतिभावान को प्रतिष्टा नहींदेने से कार्य की हानि होती है l
· प्यास से भी आदमी मरता है और पानी में डूब कर भी, पानीकी भी कमी और अधिकता दोनों खराब है, समरस की कामना करो l
· मूर्ति बोलती है पर समझता कोन है l जैसा काम है, वैसा आदमी चुनो l
· सुधार के लिए जल्दी न करो, चाहे वो आदमी का सुधार हो या देश का l
· अफवाह एक अल्पकालीन गन्दी हवा है l
· किसी का अनुभव तुम्हारे काम नहीं आवेगा l
· तुम न तो बना सकते हो, न तो विगाड़ सकते हो क्योंकि तुम्हें बना बनाया मिला हुआ है l
· तुम बैठ भी नहीं सकते कर भी नहीं सकते सोचो तुम कहाँ हो l
· सब साधन सुविधा होने पर भी संतोष नहीं है तो सामने अन्धकार है l
· हमें कोई गाली भी देता है तो यह भी हमें जानने की एक प्रक्रिया है l
· तुमको मदद करने वाला भी तुमसे कोई आशा रखता है, विचार करो l
· लोग हमेशा शुभ का इन्तजार करते है l
· भूत और वर्तमान के अन्तर को समझो l
· तुम कहाँ थे और कहां हो, सोचो l
· इच्छा भटकाव है, पर प्रेरणा सही सहयोगी है l
· प्रेम को आश्रय दो, यह जीवन स्त्रों से एक जैसी आशा नहीं करनी चाहिए l
· शरीर की कमजोरी निश्चय ही आत्मा की कमजोरी नहीं ही l
· आत्मा और देह दो हैं, एक नहीं l
· जितने भी आदमी हैं, उतने ही विचार है l
· मनुष्य का प्रसन्न रहना परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता, वह एक प्रकृति है l
· आत्मा और मन में अन्तर होना मनःस्थिति पर प्रभाव डालता है l
· शरीर का भान न होना मन की अवस्था है जो आत्मा का ज्ञान कराता है l
· सभी घटनायें समय से ही होती है, पर उसका अन्दाज नहीं होने के कारण वे भयंकर और विनाशकारी लगती हैं, स्थिरचित का पुरूष घटना को अनावश्यक या विपरीत नहीं समझता l

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