शासक या शासकीय अधिकारी की छत्र-छाया से, छत्र-छाया के बगैर चोर, लम्पट, अत्याचारी का बाहुल्य नहीं होता है l जहाँ सरकार, सरकार के अधिकारी, राष्ट्र-भक्त, जन सेवक, चरित्रवान होते है, वहाँ चोर, लम्पट, अत्याचारी बिला जाते हैं, भाग जाते हैं, प्रवर्तन कर लेते है l स्मगलर, घूसखोर का बाहुल्य उसी देश में होता है जहाँ के अधिकारी और शासक की छत्र-छाया उन पर होती है l जहाँ शासक और अधिकारी राष्ट्र भक्त, समाज-सेवक और चरित्रवान होते हैं, उस राष्ट्र में स्मगलर, मुनाफाखोर या तो बिला जाते हैं, भाग जाते हैं, या प्रवर्तन कर लेते हैं l ऐसा ही जानना चाहिये और ऐसा ही समझना भी चाहिये l जनता का कष्ट साधु को भी व्यथित करता है l औघड-अघोरेश्वर को भी जलती हुई जनता का उष्ण ताप छूता है, जो जल रहा है, जो जला रहा है, उसे उष्णता तो लगती ही है l जो उस देश में रह रहा है वह भी वंचित नहीं रहता है l
जिस चूल्हे की प्रज्वलित अग्नि को ईधन न मिले वह अग्नि शांत हो बुता जाती है, बिला जाती है l चुल्हे पर चढ़ा हुआ बटुआ कामना रोक, तितिक्षा रोक, उसमें का जल शांत और शीतल हो जाता है l विषय-रोग ही ईधन, अनेक कामनाओ रूपी अग्नि को प्रज्वलित करने में, उष्ण करने में अपना महत्व रखता है l यह याद रखना चाहिये, विषय रूपी ईधन का बिल्कुल अभाव हो l जहाँ अभाव है, अनेक कामनाओं-रूपी अग्नि प्रज्वलित चूल्हा से विला जाती है, वुता जाती है l ऐसा ही देखना सही देखना होगा l
आत्महित तथा परहित में लगा हुआ आदमी, आदमी है l आजकल के नेताओं की तरह परहित की दुहाई देने वाला,आत्महित भी नहीं कर पाता, परहित भी नहीं l मानवता से दूर-दूर रहने वाला अमानव है l
· गरीबों की आत्मा कराहती है, न जाने कब वह आवाज आकाश में फैल कर भस्म कर देगी l
· समाज को उठाना है तो स्वयं झुकना होगा तथा साथ-साथ उठाना होगा l
· सामाजिक बुराईयों में सबसे बड़ी बुराई शिकायत करने की है l दिमाग की बुरी बातों में उलझने की है l
· क्रान्ति के लिए हर व्यक्ति संगठन होता है , वहाँ आदेश प्राप्त करने का मौका नहीं रहता l स्वयं सोचना तथा स्वयं करना यही क्रान्ति है l
· समाज में लोग अपनी चाल से ही दुःखी है l
· भगवान देशवासियों को समता की भावना दे ताकि सामाजिक मतभेद मिट सके l
· गरीबों की भलाई करनी है तो एक ऐसा संगठन बनाना होगा जो इनमें साहस दे तथा दृढ़ मदद दे l
· धन से कभी भी सुख की प्राप्ति सम्भव नही है यदि त्याग हृदय में वास करे तो धन से सुख तथा परोपकार सम्भव है l
· भविष्य में समाज को डूबनेने से बचाने के लिए चुने हुए नवजवानों को जीने का प्रशिक्षण देना होगा l
· समाज में कुछ ऐसे मनुष्य चाहिए जो सिर्फ सामाजिक कार्य ही करें या तो अविवाहित रहें या पचास वर्ष के बाद परिवार की ममता छोड़ दे व अपने अनुभवों द्वारा समाज का कल्याण करे l
· समाज का रहन-सहन शिक्षित नहीं बदलेंगे तो निपिवढ़ तो अज्ञानी है ही l
· समाज में स्वार्थपरता उच्चस्तर पर है l यही सामाजिक क्रान्ति का कारण होगा l राजनैतिक दल भी इसी कुचक्र में हैं l यह शीघ्र ही विद्रोह का कारण होगा l
· जन कल्याण तथा सुधार का काम तो दूर हो गया है l भगवान फिर भारत में कुछ बलवान तथा निडर मनुष्य बनाओ ताकि देश शान्तिस्थ से काम कर सके l
· समाज में प्रेम ही न्याय का मापदंड हो सकता है l
· शासन में शक्ति अवश्य चाहिए l
· वह संगठन सिर्फ भीड़ मात्र है जहाँ एक आवाज नहीं हो, जहाँ अनुशासन नहीं हो l
· समाज में रहकर समाज के बारे में सोचना और करना वरना समाज छोड़ना होगा l
· विद्रोह तो नेता नहीं चाहता, वह जरूरत पर नेता बना लेता है l
· संगठनों में व्यक्तिगत स्वार्थ विघटन का कारण है l
· जनता अधिकतर अशिक्षित है l सुधार के लिए सम्पर्क करना होगा l
· राजनीति में दोष आ गया है यही अविश्वास का कारण है l
· समाज में रहकर भी अकेले रह सकते हो l
· नीति राज को समर्पित हो चुकी है और राज अन्धों को l
· आज का आदमी अपने कर्म से कम समाज के कारण ज्यादा परेशान है l
· परिवार या समाज में कोई किसी से मित्रता नहीं रखता वह तो समन्वयय करता है l
· गरीब और जरूरतमन्द लोगों की निःस्वार्थ सहायता और सेवा करो, तुम्हारे गुनाह माफ हो जायेंगे और तुम भुने बीज बन जाओगे l
· शासन चुस्त और दुरूस्त रखो, जो कहो उसे लागू करो l
· समाज पहले तुम्हारी जांच करेगा, फिर सुनेगा l
· समाज से बहुत ले चुके अब देने की बारी है l
· आज का समाज अन्धा है, आँख वाले भी चश्मा पहने हैं l
· लगाव का त्याग तो बड़े कठिन अभ्यास और तथाकथित कष्ट सह लेने के लिए तैयार रहना है l
· त्याग की परीक्षा सामग्री उपलब्ध होने पर ही होती है, जिसके पास कुछ है ही नहीं उसे त्याग की भावना की जाँच नहीं होती l
· त्याग प्रेम का जन्मदाता है l
· सिर्फ त्याग से सभी दोष दूर हो जाते हैं l
· त्याग कुछ पाने के लिए नहीं होना चाहिए l
· त्याग तथा करूणा की मदद से जीवन सुखी बनाया जा सकता है l
· त्याग करना है तो पहले सन्तोष को अपनाना होगा, सन्तोष की अनुपस्थिति में त्याग खलता है l
· त्यागी का साथ करने से भी कल्याण होता है l
दुरनिमित्त का पात्र चोर होता है, चुगलखोर होता है, चमचा होता है, झूठा होता है l दुरनिमित्त का पात्र कलुषित विचार-वाला होता है, कृपण होता है, क्रूर होता है, हिंसक होता है l दुरनिमित्त का पात्र अपव्ययी होता है, वेश्यागामी होता है, कुमारियों या विवाहितों के साथ गमन करने वाला होता है lविधवाओं के साथ गमन करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र अनैतिक होता है, अचारित्रिक होता है l तिलक-दहेज लेने वाला होता है, बेटी-बेचवा होता है, औघड़ और अघोरेश्वर का अपमान करने वाला होता है, अपशब्द बोलने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र गलत आचरण करने वाला होता है, महात्मा-साधु की हिंसा करने वाला होता है, महात्मा-साधु का तिरस्कार करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र अपने कुल में मैथुन करने वाला होता है, गुरूकुल में मैथुन करने वाला होता है, दुरनिमित्तका पात्र माता-पिता का तिरस्कार करने वाला होता है, गुरू-सज्जनों का तिरस्कार करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र राष्ट्र और समाज को धोखा देने वाला होता है, राष्ट्र और समाज का शोषण करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र मुनाफाखोर होता है, तस्कर होता है, जोगा-टोना करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र अपने बन्धुओं से झगड़ने वाला होता है, आश्रम में वैमनस्यता फैलाने वाला होता है, आश्रम में एक दूसरे की चुगली करने वाला होता है l ऐसे लोगों का दुरनिमित्त कटता नहीं l ऐसे लोग दुरनिमित्त के पात्र हैं l इनमें सदैव दुरनिमित्त लबालब भरा रहता है l यह पाप का घड़ा जब फूटता है तो दुरनिमित्त ऊपर आ जाता है l उबलता है तो ऊपर आ जाता है l दुरनिमित्त अपकृत्य का निवास स्थान है l दुरनिमित्त को ऐसा ही जानो l
पहले के लोग ऐसा दिखाई देते थे जैसा अब कुत्तों में दिखाई देता है l अपनी पत्नी के साथ सहवास करते थे l अगर्भवती के साथ सहवास करते थे l अपनी स्वजाति में सहवास करते थे l अब यह कुत्तों में दिखाई देता है l अब के लोग अपनों में भी सहवास करते हैं, स्वजाति में और परजाति में भी करते हैं l गर्भवती के साथ भी करते हैं, अगर्भवती के साथ भी करते हैं, रजस्वला के साथ भी करते हैं, अरजस्वला के साथ भी l अब का कुत्ता अपनी कुतिया के साथ करता है l रजस्वला होने पर करता है, अरजस्वला के साथ नहीं, दूसरों के साथ नहीं l अगर्भवती के साथ सहवास करता है, गर्भवती के साथ नहीं l
यह दूसरी बात है कि पहले के लोग दिखाई देते थे, अब के लोग नहीं l अब कुत्तों में यह दिखाई देता है, मनुष्यों में नहीं l अब का मनुष्य गर्भवती के पास जाता है, रजस्वला के पास जाता है l अरजस्वला के पास जाता है l जाति के पास जाता है, परजाति के पास जाता है l कुत्ते की तरह स्वजाति में नहीं जाता l यह कलियुग का प्रथम चरण है l कुत्ता स्वजाति में जाता है, परजाति में नहीं, रजस्वला के पास जाता है, अरजस्वला के पास नहीं l
क्रय-विक्रय और तिलक-दहेज द्वारा जो विवाह सम्पन्न होता है, उस आदमी की भार्या मैथुन-धर्म के लिए होती है, क्रीड़ा के लिए होती है, उस पुरूष के मनोरंजन के लिए होती है l उससे जन्मी हुई सन्तान अर्थ को प्रधानता देती है l धर्म की प्रधानता कभी इससे नहीं हो पाती l इस पवित्र भारत में, इस भूमि पर, वह असुर-पद को सुशोभित करता है l तिलक-दहेज रूपी क्रय-विक्रय के चलते मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता l
अघोरेश्वर वाणी, --
· जहाँ विद्या है, वहाँ विनय है l विवेक, शिष्टता और शील पाया जाता है l जहाँ विद्या थोड़ी होती है, अविद्या अधिक होती है, वहां अशिष्टता होती है l गुरू, शिष्य में वैमनस्यताता होती है l जिस पत्तल में खाते है, उस पत्तल में छेद करते हैं l जिस शिक्षा-संस्था में अविद्या घर कर जाती है, वहाँ द्वेष, कलह, एक दूसरे को नीचा दिखलाने की प्रवृति, एक दूसरे पर आरोप, प्रतिआरोप की प्रवृति दिखायी पड़ती है l
अविद्या प्रपंच है, विद्या प्रपंच-रहित है l अविद्या दूषित वायु की तरह असह्या, अशोभनीय, अपकृत्यगामी होती है l विद्या विनय,विवेक, शीलगामी होती है l ऐसी ही दृष्टि की अभी आवश्यकता है l अविद्यागामियों का संग, दुष्परिणाम होता है, दुःख उत्पादक होता है l यह त्याज्य होता है l
· पाँच बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए---कोई गर्भवती स्त्री रास्ते में हो तो उसे रास्ता देना चाहिये l कोई बोझा लिए हुए मजदूर रास्ते में हो तो उसे रास्ता देना चाहिये l शासक को भी रास्ता देना चाहिये, रास्ते में हो तो l गुरू यदि रास्ते में है तो उन्हें भी रास्ता देना चाहिये l मुर्दा को ले जाते हुए लोग हों, तो उन्हें भी रास्ता देना चाहिये l इन पांच बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये l
· "किसी भी 'ग्रन्थ को ईश्वर-प्रदत्त नहीं माना जा सकता है l यदि कोई ग्रन्थ ईश्वर-प्रदत्त माना जाय, तो उसकी भाषा भी ईश्वरीय ही होनी चाहिए l बोधगम्य भाषा, संसार भर में सर्वत्र एक सी नहीं है…. l
1. मनुष्य देव तथा असुर का मिश्रण है (देवासुर) l
2. बुढ़ापा शरीर की दुर्बलता है l
3. किसी की असलियत, जानकारी उसके चले जाने के बाद होती है l
4. काम की तृप्ति पाप नहीं है, कामी होना ही पाप मोल लेना है l
5. आज शादी का महत्व नहीं है l
6. बच्चे मां-बाप के द्वारा बुरे बनाये जाते हैं l
7. विपत्ति का मारा एकान्त ढूंढ़ता है l
8. अनुपस्थिति से ही मनुष्य की आवश्यकता मालूम पड़ती है l
9. स्वाथ मानव को अन्धा बनाता है l
10. पूँजीपति महात्माओं को भी खरीद लेते हैं l
11. गलती करने वाला पुरूष छिप जाता है तथा दोष नारी पर ही होता है l
12. जब तक भारत का हर परिवार शिक्षित नहीं होगा और जब तक स्त्रियों के दिमाग से ना समझी दूर नहीं होती तब तक देश का कल्याण होना दुष्कर है l
13. सभ्यता याशिष्टता धनी का गुण नहीं है, धनी का गुण है बचाना और बाद में सम्मान l
14. सम्मान देने तथा सम्मानित होने से धनी वर्ग अन्तर समझता है l
15. भगवान बेकार आदमी को पृथ्वी सेउठा ले तो देश का कल्याण हो जावे l
16. बुढ़ापा त्याग की प्रतिमा है जिसमें यह नहीं है वह महासंकट में है l
17. शान्तचिन्त एवं एकाग्रता साहस एवं वीरता की देन है इसे कायर नहीं पाते l
18. पैसे वाले साधु लोगों को भी खरीद लेना चाहते हैं , ऐसा उनके व्यवहार से मालूम होता है, वे प्रेम शायद ही किसी से करते हों, ईश्वर तक को वे पैसे में बाँधना चाहते हैं l
19. जब चरित्र गिर जाता है तो कोई भी साथ नहीं देता शरीर भी साथ छोड़ने लगता है l
20. कोई भी व्यक्ति आपके चिन्तन में सहायक नहीं होता l
21. तुमसे स्वार्थ सिद्ध न होने पर सभी तुम्हारा साथ छोड़ देंगे l
22. अहं ही जीने का कारण है और नाश का भी l
23. गरीबों की मदद मे पीछे यश प्राप्ति की अभिलाषा छिपी रहती है l
24. अपने न देकर, किसी से लेकर देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है l
25. गरीबों को खिला कर बड़ा बनना चाहते हैं लोग l
26. यह कटु सत्य है कि महान पुरूषों के भी छोटे समन्वय होते हैं l
27. जितने भी सम्बन्ध है गलत बन्धन है l
28. दोष इन्द्रियों का नहीं अपना है l
29. प्यार से विष पिला सकते हो, भय दिखा कर दूध नहीं l
30. तथा कथित बुद्धिजीवी और सम्पन्न लोगों ने ही समाज में विषमता पैदा किया है l
31. सभी साथ रहने वाले तुम्हारे नहीं है l
32. मल ही सौन्दर्य और बल है l
33. पुरूष का दोष पानी की लकीर है, स्त्री का दोष पत्थर की लकीर है l
· सबसे बड़ा प्यार माँ का होता है, पर सबको भरपूर प्यार नहीं मिलता l
· माता की याद से ही सफलता आधी मिल जाती है l
· माता को पूरी स्वतन्त्रता होनी चाहिए, उस पर प्रतिबन्ध लगाना होतो ईश्वर से विनय करनी चाहिये l
· ईश्वर माँ के सेवा का अवसर दो l
· बच्चे को रोते देखना माँ की बेबसी है l
· आप मां की पूजा नहीं कर सकते, आप सिर्फ उसके आशीर्वाद और सेवा आनन्द उठा सकते हैं l
· किसी भी कीमत पर माँ का आशीष लो l
1. शुभ कार्य सर्वदा कम ही लोगों द्वारा सम्पादन होता है l
2. भक्ति से आत्मशुद्धि, आत्मशुद्धि से जीवन कल्याणकारी l
3. श्रद्धा निःस्वार्थ की सहचरी है l
4. पूजा के समय मानव देव बन जाता है l
5. आज पूजा ही अनर्थो की जननी बनी हुई है l
6. पूजा से मन शून्यता को प्राप्त हो तो ठीक है, वरना ढकोसला है l
7. देवी को पाने के लिए पक्की निष्टा, सच्ची लगन सच्चा दिल और त्याग ही ऐसे उपाय है l
8. हम किसकी अराधना करें जिससे राष्टीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित हो l
9. गंगा का किनारा सब कुछ दे सकता है यदि आप अपने में रहे l
10. मन्त्र जीवन का आधार है, सिर्फ साधना नहीं l
11. जप समय का आधार है l
12. आज का व्रत तो मनोरंजन हो गया है l
13. देवी के स्थान पर जाने से कल्याण नहीं होगा l
14. नवरात्र समय काटने के लिए मत करो l
15. पवित्र स्थान पर मानसिकता का बदलाव सम्भव है l
16. बार-बार सपन्दन से मन्त्र जागृत होता है l
17. पूजा मिलने की प्रक्रिया है और अर्पण समर्पण है l
18. अच्छे विचारों का अनवरत उठना दैवीय गुण है, देवत्व है l
19. निश्चय ही लौकिक आकर्षण समाप्त होने पर ही दैवीय आकर्षण सम्भव है l
20. सचमुच यदि देवी सामने आ जाय तो टकटकी लग जाय, जबान बन्द हो जाय और इच्छायें समाप्त हो जायें उसका स्वरूप आपके अन्तर्मन का स्वरूप है l
21. जो तुम्हारे अन्दर है उससे समर्पित होकर मिलो l
22. ध्यान एक रोग है, जिसकी दवा दर्शन है l
23. सब काम सभी नहीं कर सकते साधना भी कुछ ऐसी ही है l
24. बड़ा ही आश्चर्य है, निराकार ब्रह्म की जानकारी साकार ब्रह्म से होती है l
25. निष्काम चिन्तन का अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है l
26. शक्ति अर्जित करना होता है l
27. नवरात्र साधकों के लिए नहीं भक्तों के लिए है, साधकों के लिए कोई समय अलग नहीं ता l
28. नशा से की गई साधना में एकाग्रता नहीं हो सकती l
29. मन्त्र सबसे बड़ा नशा है l
30. साधक को कभी भी परेशानी में मन्त्र का जाप नहीं करना चाहिए, इससे मन्त्र की शति क्षीण होती है l
31. पूजा करने का भी एक ध्येय होना चाहिए, जिसको चाहते हैं वह मिले तथा शान्ति मिले l
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