Aughad Baba

Aughad Baba
आया मौज फकीर का, दिया पिटारा खोल ?
चारों कुतिया राम की, करें भजन में भंग l
इनको टुकड़ा देइ के; तब करो सत्संग ll
मन भागन तो भागन दे; तूँ मत भाग शरीर l
जो कमान ढीला रहै; कैसे छूटै तीर ll
बाबा बाबा सब कहै, माई कहै न कोय l
बाबा के दरबार में, माई करै सो होय ll
भजन तजन के बीच में, मैं करूँ विश्राम l
मेरी भजन राम करें, मैं करूँ आराम ll
सन्तों सन्तों सब एक हैं, जस पोस्ता के खेत l
कोई कुदरती लाल हैं, कोई सेत के सेत ll
घूमत - घामत जाइये, जहाँ जनम का ठांव l
खूँटा गाड़ पुजाइये, तब तो 'औघड़' नाम ll
'औरो घर' हैं औघड़ का, औघड़ - पीर, सूखी नदिया बहावे नीर l
खाली के भरे, भरल ढरकावे, और फिर, चाहे तो फिर भरै ll

वाणी, --

अघोरेश्वर वाणी, --
मनुष्य पहुँचने को सब जगह पहुँच सकता है l यदि उसका ठहराव नहीं है तो तू जानो वह कुकृत्य-काया है, कलुषित विचार वाला है l जो मनुष्य जहाँ पहुँचता है, देर से पहुँचता हो तो वह कलुषित विचार वाला है l यदि ठहराव, स्थिरता उसमें है तो वह सुकृत-काया है, पवित्र विचार वाला है, स्वच्छ दृष्टि वाला है, स्वच्छ इन्द्रिय वाला है, स्वच्छ मन वाला है l जो पृथ्वी को पृथ्वी सरीखे नहीं देखता है, वायु को वायु सरीखे नहीं देखता है, तेज को तेज सरीखे नहीं देखता है, जल को जल सरीखे नहीं देखता है, अपने प्राण का आश्रय स्थान देखता है, सही माने में वही देखता है l कहो, कैसे ? पृथ्वी पूर्वजों के आदर की पात्र रही है, हमारे मेधाओं का निवास स्थान रही है l जल इस शरीर का पोषण है, पृष्ट करने वाला है l वायु इस प्राण को सम्यक् तरह से वगैर कम्पन के स्थिरता प्रदान करने वाला है l तेज हमें दृष्टि देता है, मार्ग देता है l प्रकाश अपने आपकी दूरी कम करता है l जो ऐसे देखता है, वही देखने सरीखा है l मैं ऐसा ही इनको देखता हूँ l ऐसा ही देखने वाले को सहज समाधि वाला कहकर के सम्बोधन किया जाता है l
मेरे नाम के कारण अनेक क्रूर मनुष्य तुमसे बैर रख सकते है, क्योंकि उनके स्वार्थ पर आघात होने का डर समाया रहता है l समान मनुष्य, अच्छा मनुष्य, तुम्हारा स्वागत करेगा, स्नेह करेगा, प्यार करेगा l
संसार के बहुत से चतुर लेखकों की लेखनी, सुनिश्चित नहीं है कि वह आयु वाली होंगी l महापुरूषों कीकी अनुभूति को व्यक्त करने वाली लेखनी लम्बी आयु वाली होती है l जन-समूह की वह स्वीकृति प्राप्त की हुई होती है l अखबार, पत्र-पत्रिकाओं की तरह अल्पायु नहीं होती l
गुरू वाणी
· मनुष्य जीवन बेकार है l जब प्रसन्न न रहा l जल्द शरीर का नाश होनेका अर्थ जल्द छुटकारा l
· एकान्तवास चित्त शान्ति के लिए होता है पर बहुत देर तक एकान्त मे रहना तथा ध्यानमग्न रहना अभ्यास पर निर्भर है l
· इतना देखने पर भी मनुष्य अभिमान नही छोड़ता , अगर सिर्फ अभिमान दूर हो जाय तो मानव देव बन जाय l
· श्वांस जितना कम चलेगा उतना ही मनुष्य दुरूस्त रहेगा, आयु बढ़ेगी l
· जीवन बड़ा ही प्रपंचमय है कोई किसी का नहीं है l
· निष्काम कर्म, स्वच्छ विचार एवं स्पष्ट निर्णय के साथ इस जगत में शान्ति सम्भव है l
· सत्य वचन और सत्य कर्म जीवन को निर्भीक बनाते हैं l
· निर्भीक होने से जीवन को निश्चित गति मिलती है निश्चित गति सफलता की तरफ एक प्रशस्त मार्ग है l
· जिसमें एकाग्र होकर संचालन करने की क्षमता है वह बड़ी-बड़ी समस्याओं को चिन्तन द्वारा हल कर सकता है l
· हर मनुष्य को अपने ठीक होने का प्रयास करना चाहिए इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकता l
· इस छोटे से जीवन को यह याद कर कि जल्द ही जाना है, जाने वाले की तैयारी की तरह व्यतीत करना चाहिए l
· कम से कम दस मिनट रोज समय निकालकर एकाग्र चित्त बैठने की कोशिश करो l
· मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी बाहरी वातावरण से प्रभावित होना है, वह भी कुछ देर के लिए l अच्छे या बुरे दोनों प्रभाव क्षणभंगुर होते हैं l इसलिए एकान्तवासका महत्व है l

ईश्वर द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित प्राणमयी प्राणी की उपासना ही श्रेष्ठ

जड़ पदार्थ से चैतन्य की आशा करना व्यर्थ है l कहो, कैसे ? क्या तुम ईश्वर द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित प्राणी और मनुष्यों द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति के वीच की दूरी को जानते हो ?
सच्चे साधु ईश्वर द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित, प्राणमयी प्राणी की उपासना करते हैं l गुरू के सान्निध्य में रहकर जिन व्यक्तियों ने ज्ञानार्जन किया है और शुद्धाचरण का विकास किया है उनके द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियों की उपासना-आराधना ही फलवती होती है l जिन मनुष्यों में ऐसे ज्ञान और आचरण का अभाव है, उनके द्वारा मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा अर्थहीन है l ऐसी मूर्तियां, किसी भी अन्य जड़ पदार्थ से भिन्न और कुछ नहीं हैं l ऐसी जड़-मूर्तियों की पूजा कर, मनोवांछित फल की कामना, वैसी ही निरर्थक है जैसे आकाश के तारामंडल से हार बनाने की कामना l

Avadhoot Mangal Dhan Ram Baba

Avadhoot Mangal Dhan Ram Baba

Sunday, January 3, 2010

आशीर्वचन

प्रश्न- आपका धर्म क्या है ?
उत्तर - मैं धर्म में विश्वास नहीं करता हूं, क्योंकि धर्म ने मानव जाति को अत्यन्त कठोर वर्गो में विभक्त कर दिया है l धर्म ने ही मनुष्य को मनुष्य को मनुष्यता से वंचित कर दिया है l धर्म के ही चलते मनुष्यता कुंठित हो रही है l इसलिए मैं किसी एक धर्म की विचारधारा अपनाने का प्रबल विरोध करता हूंl
प्रश्न- किसी धर्म या ऐसी किसी स्थिति का अनुसरण क्यों किया जाय ?
उत्तर - किसी धर्म का अनुसरण नहीं करना चाहिए l इसके स्थान पर मनुष्य को उन सज्जन पुरूषों, आदरणीय पुरूषों, प्रतिष्ठित एवं निश्चल पुरूषों के आदेशों का पालन करना चाहिए, जिनका कोई धर्म नहीं है l
प्रश्न - गुरू क्या है ?
उत्तर - गुरू तुम्हारा मित्र हो सकता है, तुम्हारा सहायक या सेवक भी हो सकता है l जो व्यक्ति तुम्हें प्रभावित करता हो, जिससे तुम्हें वार्तालाप करना प्रिय लगे, जिसकी बातों को सुनने की तुम्हारे भीतर ललक हो, ऐसे व्यक्ति को पहचान लेना, तुम्हारे उपर निर्भर है l गुरू भगवान नहीं होता, मनुष्य भी नहीं l वह भगवान और मनुष्य के बीच में है l वह "हां" और "ना" के बीच में है l मेरे मित्र, गुरू की व्याख्या नहीं की जा सकती l वर्णन नहीं किया जा सकता l उसका तो अनुभव अथवा मनन किया जा सकता है l
प्रश्न- क्या ईश्वर का दर्शन कर पाना व अनुभव कर पाना सम्भव है l
उत्तर - ईश्वर शक्ति है l तुम उसका अनुभव कर सकते हो l उसका तत्वबोध प्राप्त कर सकते हो l ईश्वर कोई साकार मूर्ति नहीं है l वह प्राणतत्व है l तुम्हारी प्राणात्मा ही ईश्वर के आकार रूप में सम्मुख प्रकट होती है l
प्रश्न - अघोर धर्म क्या है ? तथा एक औघड़ क्या होता है ?
उत्तर - अघोर कोई धर्म नहीं है l यह एक मार्ग है जो मानवता का पथ प्रशस्त करता है l और औघड़ वही है जो शान्तप्रिय हो तथा उदार स्वभाव से सम्पन्न हो l औघड़ एक मानव है l वह सन्त नहीं होता, ईश्वर भी नहीं होता l
प्रश्न- जीवन का उदेश्य क्या है ?
उत्तर - जीवन का मुख्य उदेश्य अपने को जानना हैं तुम कौन हो ? क्या हो ? तुम इस दुनिया में क्यों आये हो ? तथा तुम्हारा कर्तव्य क्या है ? तुम यदि अपने आपको नही जानते तो तुम्हारा जीवन भृतक तुल्य है l
प्रश्न- इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति का आचार- विचार कैसा होना चाहिए ?
उतर - इसमें आचार-विचार से सम्बन्धित कोई कठोर नियम या प्रतिबन्ध नहीं है l इसमें सर्वोत्तम जीवन व्यापार यही है l कि उस महापुरूष की निकटता प्राप्त करो जो जीवन का रहस्य जानता है l ऐसे महापुरूष को पहचानना तुम्हारा काम है l
प्रश्न - यह भारत देश कुछ काल क्रम से विश्व के निर्धनतम देशों में कैसे आ गया ?
उत्तर - सुमित्र ! वे दिन बीत गये l हम दुनिया को यह दिखाने लायक हो गये हैं कि आज भारतवर्ष वह नहीं रहा जो बीस या तीस वर्षो पहले था l तुम उन लोगों से कह सकते हो कि भारत ही समस्त संसार का नेतूत्व करेगा, तथा कुछ ही वर्षो में दरिद्र राष्ट्र कहलाने की कलंक से छूट जायेगा l मैं तुम्हें सटीक समय तो नहीं बता सकता किन्तु वह स्थिति तुम्हारे जीवन काल में ही आ जाने वाली है lमुझे ऐसा कहने में अत्यन्त गर्व3 है l चमत्कारों के जरिए हम ऐसा कुछ करने नहीं जा रहे है l हम कठिन परिश्रम द्वारा बुद्धिमत्तापूर्ण योजनाओं से तथा यदि भगवान है तो फिर उनके माध्यम से भी करने वाले हैं l हम देखेंगे कि वह संकल्प सिद्ध हुआ है और यह कार्य सम्पन्न होकर ही रहेगा l




· साधु को भक्ति भाव से क्या मतलब l
· योगी को जीवन भर योगानाना पड़ता है l
· सभी साधु सबके लिए नहीं होते है, नसभी स्थान सबके लिए हो सकते हैं l
· बाहरी व्यवहार से साधु नहीं जाना जा सकता l
· साधु के लिए क्षमा ही अस्त्र है l
· मानवता ज्ञानी का लक्षण है l
· महापुरूषों के वाक्य पर विश्वास करो, कहीं न कहीं उसमें सच्चाई रहती है l
· साधु से जाँत-पांत न पूछिये, पूछ लीजिए ज्ञान l
· साधक को भी देर खलती है उसके कई कारण हो सकते है, विचार करो l
· साधु के यहाँ लेने के लिए ही जाते हैं l
· लक्ष्य ही साधना है लक्ष्य पर सन्देह साधक की परेशानी है l
· साधक को 'होनी' भासती है l
· साधु बहुत कम हैं, जो है उनमें भी आदमी बहुत कम हैं l
· योगी एक एक्स-रे मशीन की तरह है जो आपका सूक्ष्मता से अध्ययन करता है l
· सारी विकृतियाँ शुभ एवं अशुभ अघोरी की छाया में निष्क्रिय बन कर बैठती हैं l
· अघोरी को देखो वह तन से कहीं और मन से कहीं और रहता है l
· निष्काम शिष्य गुरू से सब कुछ ले लेता है l
· स्थित प्रज्ञ मनुष्य को निश्चय ही देह का भान नहीं होता l
· जिस साधु-सज्जन का प्रचार उसकी क्षमता से कम होता है वह भाग्यशाली है l
· जो कुछ देकर प्रसन्न होता है उस समय उसकी प्रसन्नता में दैवीय शक्ति का प्रदर्शन होता है l
· औघड़ शिव स्वरूप होते हैं l इनकी वन्दना इसी रूप में होती रही है l फिर भी समाज में प्रवेश नहीं पा सके l कुछ लोग ही इनकी चमत्कारिक शक्तियों के कारण ही पूजते रहे हैं l

Monday, December 14, 2009

फोटो गैलरी mangaldhanram


अघोरेश्वर वाणी, --
नियम का, समय काल पाकर, परिवर्तन-परिमार्जन करना चाहिये l एक ही खूँटा से पशु सरीखे बंधे रहने को छोड़ना चाहिये l जिसमें ऐसा होता है, वह युग-पुरूष समय और काल का जानने वाला होता है l उसी के साथ वह उन्नति भी करता है l विधान तुमने देखा है, सुना भी है कि हजारों साल से रूपान्तर होते-होते आज इस रूप में दीख रहा है l कर्तव्य के साथ अधिकार का अधिकार सबको है l यह पहले नहीं था l
पहले कर्तव्य करने पर भी अधिकार की अधिकारी सामहिक जनता नहीं रहती थी l आज, वर्तमान जाति-धर्म, प्रान्तीयतासे उठकर, कर्तव्य के साथ, अधिकार का अधिकारी होकर, एक दूसरे से गले मिलता हुं---आर्लिगन करता हूं l एक दूसरे को भारत माता के पुत्र के नाते भाई समझता हुं l
इसी तरह से आने वाला काल, समय के अनुकूल होना चाहिये, एक ही नाद पर चारा खाने वाले पशु के सदृश---रूढ़ता को त्यागना चाहिये l जब पुराने वृक्ष में सुकोमन,सुन्दर स्वादिष्ट फल नहीं मिलता तो वहाँ नये वृक्ष रोपण करना चाहिए l

गुरू वाणी
· अपनी ही भूल से नाश होता है, अन्य कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ता l
· कभी-कभी कुछ भी समझ में नहीं आता l
· मनुष्य स्वयं अपने वश में नहीं है तो दूसरे को वश में क्यो करना l
· अधिक लोग अपने दुःख निवारण का उपाय इसलिए नहीं करते हैं कि उस उपाय से दूसरे का भी दुःख दूर हो जायेगा l
· संसार में दोषी कोई नहीं है, सभी शरीर के अभिमान में अन्धे हैं l
· सम्पत्ति ही सुख नहीं है, सुन्दरी भी सुख नहीं है इनके भोक्ताओं को ही दुःख है l
· मनुष्य के अन्दर जो कमजोरियाँ है वे बल लगाने पर भी धहीं मिटती, उसके लिए गुरू कृपा ही एक माध्यम है l
· किस पर विश्वास किया जाय और किसका सहयोग लिया जाय l
· गलत काम का अवसर होता है कामी उसी का खोज करता है l
· बहुत सा अनावश्यक कार्य परम्परावश किया जाता है l
· बहुत सा अनावश्यक कार्य परम्परावश किया जाता है l
· तुम्हारा भला चाहने वाला कोई नहीं है यदि उसका अपना हित उसमें न हो l
· लोग डरते-डरते मरते रहते हैं l
· बहुत से अच्छे काम भी बुरे कर्मो को ढकने के लिए किया जाता है l
· मनुष्य अपने ही बनाये हुए जाल में फंसा है और मिथ्या ईश्वर पर दोष लगाता है l
· अपनी गलती तुम समझते हो पर लाचार मालूम पड़ते हो l
· तुम आदत से दबे हो सोच कर भी कुछ कर नहीं सकते l
· मन तुम्हें दुविधा में रखता है, इस व्यवहार से बचो l
· जब अन्दर ही द्वन्द्व चलता हो तो बाहर कैसे बचना l
· जो संकल्प बदलता है, वह इच्छाओं के नरक में डूबता है l
· मनुष्य लाचार है अपने साथी से l
· न कोई साथ देता है और न कोई साथी है l
· लाचारी का साथ है इसलिये दुःखदायी है l
· दिन में रात चाहते हो और रात में दिन, तुम्हें दोनों चाहिए l
· भय पाप है इससे बचो l लगाव दुःख का कारण है l
· लक्ष्यहीन मनुष्य अपनी लाश को अपने ढोता है l
· मनुष्य अपने संकल्प में जीता मरता है l
· आज का आदमी बहुत उलझा हुआ है , वह न तो व्यवहार में स्पष्ट है और न बातों मे शायद यह सबको खुश करने की नीति के कारण ही है , इस युग में सफल होने का एकमात्र उपायय मूक दर्शक बनना ही है l
· प्रयास कर प्रसन्न नहीं रहा जा सकता l
· मनुष्य कितना बन्धन, में है तथा कितना आजाद है, कहना कठिन है, किस क्षण में क्या होगा कहना कठिन है, इस पर इतना अंहकार, वाह रे मानव l
· मनुष्य कमजोरी का पोषक लगता है , जिस आदत से उसे नुकसान होता, जान कर भी वह छोड़ नहीं पाता तो फिर नये विचार कैसे अपना सकता है. अगर मनुष्य को लगाव का त्याग आ जाय तो वह कुछ भी करने मे समर्थ है l
· सब मरते हैं, लेकिन जीने की इच्छा नहीं मरती l
· जो अपना प्रयास छोड़कर दूसरे के भरोसे बैठता है वह अभागा है l
· आदमी जन्म से ही अन्धा होता है l
· आकर्षण एक दोष है, जो असलियत पहचानने से बहुत दूर है, यह चाह और स्वभाव का प्रतीक है, सोचो इसको l
· डर एक भयानक रोग है यह अच्छे काम में अधिक बुरे काम में कम होता है l
· मनुष्य गलती करते समय भय नहीं करता बल्कि इस गलती को कहने में भय करता है , यदि ऐसा भय गलती करते समय हो तो जीवन में कभी गलती हो ही न l
मनुष्य अपूर्ण है, अपूर्णता ही गरीबी है l

· नारी की आवश्यकता उससे पूछने पर नहीं बल्कि साथ करने पर मालूम पड़ती है l
· ईर्ष्या रहित नारी सरस्वती है l
· नारी से दूर रहो या हर असंभव घटना के लिए तैयार रहो l
· नारी स्वभाव से कृपण होती है पर उसे बात करने में अवश्य कृपण होना चाहिए l
· अशिक्षित नारी की आजादी परिवार के लिए श्राप है l
· किसी भी नारी के अधिक नजदीक जाना खतरा है l
· नारी का निर्भीक होना बहुत जरूरी है l
· नारी ह्दय प्रधान है तथा पुरूष बुद्धि प्रधान l
· आज की नारी शिक्षा बिना अंधी है l
· जो स्त्रि पति की पूजा नहीं करती उसे पूजने योग्य देवता ढूँढने में ही जीवन खतम हो जाता है l
· नारी में महान शक्ति है पर आर्श्च्य है कि अधिकतर लोग नारी पाने की पूरी कोशिश करते हैं, नारी तो मिल ही जाती है पर उसकी भक्ति नहीं मिल पाती l
· नारी पूजनीय है पर उसका स्पर्श घातक है l
· नारी नदिया की टेढ़ी धार बिरले पुरूष उतरे पार l
· महिलाओं को साथ चलावें तो ज्यादा अच्छा होगा है l
· गृहिणी तो घर की मालकिन होती है फिर समानाधिकार की मांग क्यों l
· नारी न हो तो जगत न हो l
· नारी पुरूष को निखारती है l

· गुरू सोच समझ कर चुनो l

· गुरू की आज्ञा आँखे बन्द कर मानो l

· सद्गुरू की आवश्यकता ईश्वर को बतलाने के लिये है l

· गुरू गेह को जाइये तजि कर सब सनेह l

· गुरू में दोष कैसा, वह दिन याद करो जब आश्रय माँगा था l

· गुरू मूर्ति है सिर्फ दर्शन से लाभ उठा सकते हो l

· गुरू व्यवहार है, उदाहरण है l

· गुरू तुम्हारे कार्य में सहयोग करेगा, तुम्हारा कार्य भी कर सकता है, वैसा बनो l

· गुरू का संकेत समझो और चल दो l

· गुरू तत्व के प्रवेश से ही आत्म ज्ञान होता है l

· गुरू का हर कदम, हर शब्द एक सीख देता है l

· गुरू भगवान को कोई सतर्कता बरत कर खुश नही कर सकता, न तो खूब सेवा कर के ही खुश किया जा सकता है l

· वह तो अपने में मस्त रहता है उसे सेवा कराने से क्या मतलब, क्योंकि सेवक अनगिनत हैं l

· और किसकी सेवा कम है l

· क्या जो साथ रहकर शरीर की सेवा करता है वही उसे खुश कर सकता है l

· सेवा करने वाला खुश होता हो और सेवा से निवृत्ति का दिन नहीं गिनता हो तो उसके हक में ठीक है l

· गुरू भगवान तो उसका भी ख्याल रखता है जो अवसर न प्राप्त कर सका पर अपने साधारण व्यवहार और चरित्र मे रमता है, वह भी कुछ कम नहीं lसही रहने पर गुरू की रस्सी शिष्य के हाथ में l

· गुरू व्याप्त है प्रेरणा लो खुश रहो , यदि दूसरो को दिखाना चाहते हो कि मैं बहुत नजदीक हूँ तो तुम्हारी यह इच्छा पूरी हो गई फिर कुछ नहीं, क्योंकि तुमको पता नही कि उसके बाद क्या , वह तो सरल व्यवहार पर मरता है , वह तुम्हें वायु के माध्यम से संदेश देगा दर्शन देगा पर पहचानना तुम्हारा काम है l

· गुरू ज्ञान देने का अधिकारी है, शिष्य का काम है उसे व्यवहार में लाना व्यवहार मे नहीं लाने पर ज्ञान खत्म हो जाता है l

· जब साथ रहने वाले विश्वास न करें तो जीवन दूभर हो जाता है गुरू बहुत सोच समझ कर बनाना चाहिए यदि गुरू पर जरा भी सन्देह हुआ तो कोई कार्य सफल नहीं होता गुरू शरीर नहींविश्वास है l

· गुरू को छिप कर देखने से उसके असली भाव चिन्तन का पता चलता है और व्यवहार सीखने में भी आसानी होती है गुरू नहीं बोल कर भी सब कुछ सिखा देता है l

· गुरू वह है जो सामने न होते हुए भी प्रत्यक्ष रहे

· l गुरू की उत्पत्ति शिष्य के ह्दय से होती है l

· न सभी गुरू के पात्र है और न सभी मनुष्य शिष्य के पात्र है l

· गुरू इतना बताता है - बैठिये अपने आप सोचिये l

· संकेत पर नहीं चलने पर गुरू भी साथ देने में असमर्थ हो जाता है l

अघोरेश्वर वाणी
· जो प्राणी अनुकूल है अपना, वह खून है अपना l जो छल-छिद्र से, कपट से, स्वार्थ से अपने अनुकूल होने का दम भरताते है, वह खून नहीं पानी है l

· पूरे जगत में कर्म से हो साधु होता है, कर्म से ही चोर होता है, कर्म से ही ब्राह्मण होता है, कर्म से ही क्षत्रिय होता है, कर्म से ही वैश्य होता है, कर्म से ही शूद्र होता है l न जन्म से चोर होता है, न जन्म से साधु होता है, न जन्म से क्षत्रिय यहोता है न जन्म से ब्राह्मण होता है, न जन्म से वैश्य होता है, न जन्म से शूद्र होता है l जन्म से होता तो बहुत से ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य मनोवृत्ति के होते है और शूद्र वैश्य के कर्म करते हैं l बहुत से वैश्य और शूद्र, क्षत्रिय और ब्राह्मण मनोवृत्ति के होते हैं तथा क्षत्रिय एवं ब्राह्मण के कर्म करते हैं l चतुर मनुष्यों का यही निश्चय है l


अघोरेश्वर वाणी :-
ओछे मनुष्य का संग दुःखद होता है l दुष्परिणाम देने वाला होता है l ओछा मनुष्य कौन होता है ? जिसके खून में शुद्धता नहीं है, चाहे उसका मातृ-पक्ष हो या पितृ-पक्ष हो l सात पुश्त के मातृ-पक्ष या पितृ-पक्ष का खून जिसका शुद्ध होता है, वह ओछा नहीं होता है l लंगड़े-लूले को जन्म देने वाला नही होता, लोभी और व्यभिचारी को जन्म देने वाला नहीं होता, माता-पिता को प्रताड़ित करने वाले को जन्म देने वाला नहीं होता l जो कोई कुल में ओछे मनुष्य को जन्म देता है, लंगड़े और लूले को जन्म देता है, माता-पिता को प्रताड़ित करने वाले को जन्म देता है, उसे तुम जानो या तो मातृ-पक्ष या पितृ-पक्ष के खून में अशुद्धता है l
तुम तो जानते हो कि विदेह पुत्री के साथ कोशल नरेश दशरथ के बड़े पुत्र की शादी हुई l खून की अशुद्धता के कारण घर-बार-राज्य छूटा, वनों में घूमते रहे l लंका में खून-खच्चर हुआ l वैदेही, विजय के बाद फिर वापस आयीं तो गर्भवती अवस्था में फिर निकाली गयीं l वाल्मीकि के आश्रम में प्रसव किया l दो जनों को जन्म दिया l
महापराक्रमी वाहुबल वाले लव-कुश ने अपने पिता द्वारा अश्वमेघ के निमित्त छोड़े हुए घोड़े को पकड़ कर बांध दिया l कोशल राज्य की सारी सेना को तो युद्ध में पराजय का मुँह देखना पड़ा l वे महाबली पुत्र, दशरथ के चारों पुत्रों को, जो उनके पिता और चाचा लगते थे, बांध कर ले गये, अपनी माता सीता के सामने l इसका क्या कारण है,
वैदेही का जन्म आदरणया सुनयना के गर्भ और जनक के वीर्य से न होने के कारण खून की शुद्धता, मातृ-पक्ष, पितृ-पक्ष के सात पुश्तों तक न रहने के कारण, विकृति, कुप्रभाव से वंचित नहीं रह सकता है,l

क्षत्रियों और ब्राह्मडों को अपने पूर्वजों की उपेक्षा करते देख रहे हो l इसी उपेक्षा के कारण वर्तमान उनसे दुःखी है और वर्तमान से क्षत्रिय और ब्राह्मण भी दुःखित हैं l भविष्य का सन्देह भी बना हुआ है l कहो कैसे ? अनेक देवता देवियों को विग्रह बनाकर, अपने प्राण जो पूज्य हैं, उसे पूजा-स्थली में नहीं, विग्रह में स्थापित किया, ब्राह्मणों, क्षत्रियों के पूर्वजों ने l प्राण-प्रतिष्ठा की l जब वे स्वर्गगामी हो गये, उनके प्राण से प्रतिष्ठित विग्रह, उनकी औलाद की श्रद्धा, शील और स्नेह से वंचित रहते हैं l वह उनके प्रति उपेक्षा की भावना रखता है l समान दृष्टि वर्तमान में न होने के कारण, वर्तमान उससे दुःख पाता है l पुजारी रखा है l जिन पुजारियों के हाथ का छुआ तृण, जल, फल, अन्न ग्रहण करना बिल्कुल वर्जित है l पूर्वजों की तरफ से, अपने ऋषियों की तरफ से l क्यों वर्जित है ? स्मगलरों, मुनाफाखोरों द्वारा बनवाये गये मन्दिर देखे हैं तूने l उनमें विग्रह-मूर्ति भी तूने देखी है l उस स्मगलर, मुनाफाखोर के प्राण की उसमें प्रतिष्टा भी हुई है l उस स्मगलर, मुनाफाखोर का प्राण उस विग्रह मूर्ति में प्रतिष्टित है l उस पूजा गृह में जाकर दंड-प्रणाम करना उस स्मगलर को दंड-प्रणाम करने सरीखा है l उसमें राग-सहित भोग लगता है l इन्द्रियों का सुख देने में अनुरक्त पुजारी उसमें भोग लगाता है l ऐसे पुजारी के हाथ का छुआ या दिया हुआ, अग्राह्यहै l स्मगलर-मुफाखोर के प्राण का जूठन, सज्जन पुरूषों के कृतों को हानि पहुँचाने वाला होता है, तेज को हानि पहुँचाने वाला होता है, ओज को हानि पहुँचानेवाला होता है, श्री को हानि पहुँचानेवाला होता है l श्री-विद्या को वंचित रखने सरीखे होता है l भूलकर भी स्मगलर-मुनाफाखोरों द्वारा प्रतिष्ठित की हुई या कलुषित-काया असंस्कारी द्वारा प्रतिष्ठित की हुई मूर्तियों का भोग, राग, जल, फल, अन्न कभी ग्रहण नही करना चाहिये l इससे तेज का हनन होता है l अपने आप की उपेक्षा सरीखा होता है lअपने आप का पुण्य, बहती नदी के वेग की तरह बह जाता है l महापुरूषों के और अपने पूर्वजों के जहाँ प्राण प्रतिष्टित हों, जिसमें प्राण प्रतिष्टित हो, वहाँ अपने पूर्वजों का प्रसाद ग्रहण करना, महापुरूषों और पूर्वजों का आदर करने सरीखा होता है l ऐसा जो जानता है, वह अपनी परम्परा का आदर करनेवाला होता है l महापुरूषों की श्रृखला में अपने आप को पानेवाला होता है l

Wednesday, December 2, 2009

फोटो गैलरी mangaldhanram

गुरू वाणी
· मानव जाति बहुत कुछ खो चुकी है l
· अन्धा दूसरे को अन्धा कैसे कहे l
· तुम्हारे साथ वाला भी तुम्हें अच्छी तरह से नहीं पहचानता l
· टेढे-मेढ़े आईना में तुम्हारा मुँह भी टेढ़ा दीखेगा l
· धार्मिक ग्रन्थों में अधिक आदर्श ही है l
· एक दूसरे जैसा कभी नहीं होता l
· आपके धर्मग्रन्थों में देवताओं का जैसा चित्रण है शर्मनाक है l
· यदि खर आग से जले तो दोष किसका l
· आयु में बड़ा होना ज्ञान में बड़ा होना नहीं है l
· प्यार से बल मिलता है l
· स्वास्थ लाभ की कामना से मनुष्य अस्वस्थ नहीं होता l
· मनुष्य अनजानते ही आ गया l
· धन मिलने से अच्छा है भले आदमी का मिलना l
· श्रम से गरीबी भागती है जब ईमान साथ देता है l
· पुराने लोगों से मिलने से सुख मिलता है l
· इस शरीर की कब क्या गति होगी कोई नहीं जानता l
· रक्षा तो बन्धन तोड़ने में है l
· तुम्हारे श्वांसों से ही गलत वायु प्रवेश करती है l
· प्यार भावना है, समर्पण नहीं l
· जो मांगते है वह ईश्वर से प्रेम नहीं करते हैं l
· भगवान से भी डरना बुरा है l
· गणतन्त्र दिवस भारतीयों का त्योहार नहीं बन सका l
· अध्ययन का कोई स्थान नहीं होता, वह तो मन में ही होता है l
· विचार और कर्म में अन्तर ही दुःख का कारण है l
· मनुष्य को चाहिये कि स्वस्थ रहते ही एकान्त जीवन व्यतीत करने की कला सीख ले l
· बुढापे में या अस्वस्थ होने पर कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा या अन्य कामों से फुरसत मिलने पर ही साथ देगा , वह भी कोई बुरा न कहे इसलिये l
· यादगारी की बातें नहीं होती काम होता है l
· इन्तजार भी एक तपस्या है l
· तुम जिसको जानते हो, क्या वह भी तुमको जानता है, चाहे भगवान ही क्यों न हो l
· कोई किसी का साथ नहीं देता, अपना सब कुछ मिटाकर ही साथ सम्भव है l
· क्या तुमने किसी पर विश्वास किया है अगर किया है तो क्या बदलाव आया या क्या स्थिरता आई l
· विचार के उतार-चढ़ाव का असर चेहरे पर होता है देखो l
· समय की दूरी असंतोष पैदा करती है पर धीरज उसे दूर करता है l
· लक्ष्य की प्राप्ति में चलने में सुख मिले तो लक्ष्य की प्राप्ति समझो l
· बगल के निवासी से सतर्क रहो, वह तुम्हारी कमजोरी जानने की कोशिश करता है l
· मारना है तो मरना सीखो l
· प्यार भी मौत का कारण बन सकती है और नफरत भी l
· अपने चेहरे को निहारो दुःख में भी सुख में भी सोचो lजिसने तुम्हें यहाँ लाया है वह तुम्हें देखता है, तुम भी उसे देखो, समझो l
· जो भारतीय देश के बाहर रहते हैं, उन्हें वहाँ घर में भारतीय चरित्र को बनाये रखना होगा l सुधार भय से नहीं स्वभाव से होना चाहिए l


· जिसमें गुणों की समता नहीं है, वह बाहर समता का व्यवहार कैसे दे सकता है l
· तुम जैसा देखते हो, संसार वैसा नहीं है l
· विज्ञान को तो समुद्र में उठने वाले तूफान का अध्ययन करना चाहिए l
· बढ़ता हुआ भय और अनर्थ तो अपनी अन्तर से मिलने जा रहे है l
· सोचो, क्या तुम अपने लिए परेशान हो या दुःखी मानवता के लिए l
· आत्मज्ञानी प्रकृति का संकेत समझता है l
· मन में उठने वाले प्रश्नके हल होने पर ज्ञान बढ़ता है l
· पार्वती तप की प्रतीक है l
· जब शिक्षा रोजगार परस्त होगी तब ज्ञान के लिए दीक्षा का महत्व बढ़ जावेगा l
· अपने साथियों को अच्छे कर्म के लिए प्रोत्साहित करो, इससे दुर्गुण कमजोर पड़ जावेंगे l
· सद् गुण सीखने से नहीं आते इसके लिए साथ करना होता है l
· मनुष्य बुरा नहीं पैदा होता, परिस्थिति एवं वातावरण जिम्मेदार होते है l
· मनुष्य में उसी का प्रकाश है, जरा स्वच्छ बन कर देखो l
· अगर तुम निष्क्रिय बनते हो तो वातावरण तथा परिस्थितियाँ भी साथ छोड़ देंगी l
· प्रतिभावान को प्रतिष्टा नहींदेने से कार्य की हानि होती है l
· प्यास से भी आदमी मरता है और पानी में डूब कर भी, पानीकी भी कमी और अधिकता दोनों खराब है, समरस की कामना करो l
· मूर्ति बोलती है पर समझता कोन है l जैसा काम है, वैसा आदमी चुनो l
· सुधार के लिए जल्दी न करो, चाहे वो आदमी का सुधार हो या देश का l
· अफवाह एक अल्पकालीन गन्दी हवा है l
· किसी का अनुभव तुम्हारे काम नहीं आवेगा l
· तुम न तो बना सकते हो, न तो विगाड़ सकते हो क्योंकि तुम्हें बना बनाया मिला हुआ है l
· तुम बैठ भी नहीं सकते कर भी नहीं सकते सोचो तुम कहाँ हो l
· सब साधन सुविधा होने पर भी संतोष नहीं है तो सामने अन्धकार है l
· हमें कोई गाली भी देता है तो यह भी हमें जानने की एक प्रक्रिया है l
· तुमको मदद करने वाला भी तुमसे कोई आशा रखता है, विचार करो l
· लोग हमेशा शुभ का इन्तजार करते है l
· भूत और वर्तमान के अन्तर को समझो l
· तुम कहाँ थे और कहां हो, सोचो l
· इच्छा भटकाव है, पर प्रेरणा सही सहयोगी है l
· प्रेम को आश्रय दो, यह जीवन स्त्रों से एक जैसी आशा नहीं करनी चाहिए l
· शरीर की कमजोरी निश्चय ही आत्मा की कमजोरी नहीं ही l
· आत्मा और देह दो हैं, एक नहीं l
· जितने भी आदमी हैं, उतने ही विचार है l
· मनुष्य का प्रसन्न रहना परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता, वह एक प्रकृति है l
· आत्मा और मन में अन्तर होना मनःस्थिति पर प्रभाव डालता है l
· शरीर का भान न होना मन की अवस्था है जो आत्मा का ज्ञान कराता है l
· सभी घटनायें समय से ही होती है, पर उसका अन्दाज नहीं होने के कारण वे भयंकर और विनाशकारी लगती हैं, स्थिरचित का पुरूष घटना को अनावश्यक या विपरीत नहीं समझता l

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अघोरेश्वर वाणी:-
शासक या शासकीय अधिकारी की छत्र-छाया से, छत्र-छाया के बगैर चोर, लम्पट, अत्याचारी का बाहुल्य नहीं होता है l जहाँ सरकार, सरकार के अधिकारी, राष्ट्र-भक्त, जन सेवक, चरित्रवान होते है, वहाँ चोर, लम्पट, अत्याचारी बिला जाते हैं, भाग जाते हैं, प्रवर्तन कर लेते है l स्मगलर, घूसखोर का बाहुल्य उसी देश में होता है जहाँ के अधिकारी और शासक की छत्र-छाया उन पर होती है l जहाँ शासक और अधिकारी राष्ट्र भक्त, समाज-सेवक और चरित्रवान होते हैं, उस राष्ट्र में स्मगलर, मुनाफाखोर या तो बिला जाते हैं, भाग जाते हैं, या प्रवर्तन कर लेते हैं l ऐसा ही जानना चाहिये और ऐसा ही समझना भी चाहिये l जनता का कष्ट साधु को भी व्यथित करता है l औघड-अघोरेश्वर को भी जलती हुई जनता का उष्ण ताप छूता है, जो जल रहा है, जो जला रहा है, उसे उष्णता तो लगती ही है l जो उस देश में रह रहा है वह भी वंचित नहीं रहता है l

जिस चूल्हे की प्रज्वलित अग्नि को ईधन न मिले वह अग्नि शांत हो बुता जाती है, बिला जाती है l चुल्हे पर चढ़ा हुआ बटुआ कामना रोक, तितिक्षा रोक, उसमें का जल शांत और शीतल हो जाता है l विषय-रोग ही ईधन, अनेक कामनाओ रूपी अग्नि को प्रज्वलित करने में, उष्ण करने में अपना महत्व रखता है l यह याद रखना चाहिये, विषय रूपी ईधन का बिल्कुल अभाव हो l जहाँ अभाव है, अनेक कामनाओं-रूपी अग्नि प्रज्वलित चूल्हा से विला जाती है, वुता जाती है l ऐसा ही देखना सही देखना होगा l
आत्महित तथा परहित में लगा हुआ आदमी, आदमी है l आजकल के नेताओं की तरह परहित की दुहाई देने वाला,आत्महित भी नहीं कर पाता, परहित भी नहीं l मानवता से दूर-दूर रहने वाला अमानव है l
गुरू वाणी
· गरीबों की आत्मा कराहती है, न जाने कब वह आवाज आकाश में फैल कर भस्म कर देगी l
· समाज को उठाना है तो स्वयं झुकना होगा तथा साथ-साथ उठाना होगा l
· सामाजिक बुराईयों में सबसे बड़ी बुराई शिकायत करने की है l दिमाग की बुरी बातों में उलझने की है l
· क्रान्ति के लिए हर व्यक्ति संगठन होता है , वहाँ आदेश प्राप्त करने का मौका नहीं रहता l स्वयं सोचना तथा स्वयं करना यही क्रान्ति है l
· समाज में लोग अपनी चाल से ही दुःखी है l
· भगवान देशवासियों को समता की भावना दे ताकि सामाजिक मतभेद मिट सके l
· गरीबों की भलाई करनी है तो एक ऐसा संगठन बनाना होगा जो इनमें साहस दे तथा दृढ़ मदद दे l
· धन से कभी भी सुख की प्राप्ति सम्भव नही है यदि त्याग हृदय में वास करे तो धन से सुख तथा परोपकार सम्भव है l
· भविष्य में समाज को डूबनेने से बचाने के लिए चुने हुए नवजवानों को जीने का प्रशिक्षण देना होगा l
· समाज में कुछ ऐसे मनुष्य चाहिए जो सिर्फ सामाजिक कार्य ही करें या तो अविवाहित रहें या पचास वर्ष के बाद परिवार की ममता छोड़ दे व अपने अनुभवों द्वारा समाज का कल्याण करे l
· समाज का रहन-सहन शिक्षित नहीं बदलेंगे तो निपिवढ़ तो अज्ञानी है ही l
· समाज में स्वार्थपरता उच्चस्तर पर है l यही सामाजिक क्रान्ति का कारण होगा l राजनैतिक दल भी इसी कुचक्र में हैं l यह शीघ्र ही विद्रोह का कारण होगा l
· जन कल्याण तथा सुधार का काम तो दूर हो गया है l भगवान फिर भारत में कुछ बलवान तथा निडर मनुष्य बनाओ ताकि देश शान्तिस्थ से काम कर सके l
· समाज में प्रेम ही न्याय का मापदंड हो सकता है l
· शासन में शक्ति अवश्य चाहिए l
· वह संगठन सिर्फ भीड़ मात्र है जहाँ एक आवाज नहीं हो, जहाँ अनुशासन नहीं हो l
· समाज में रहकर समाज के बारे में सोचना और करना वरना समाज छोड़ना होगा l
· विद्रोह तो नेता नहीं चाहता, वह जरूरत पर नेता बना लेता है l
· संगठनों में व्यक्तिगत स्वार्थ विघटन का कारण है l
· जनता अधिकतर अशिक्षित है l सुधार के लिए सम्पर्क करना होगा l
· राजनीति में दोष आ गया है यही अविश्वास का कारण है l
· समाज में रहकर भी अकेले रह सकते हो l
· नीति राज को समर्पित हो चुकी है और राज अन्धों को l
· आज का आदमी अपने कर्म से कम समाज के कारण ज्यादा परेशान है l
· परिवार या समाज में कोई किसी से मित्रता नहीं रखता वह तो समन्वयय करता है l
· गरीब और जरूरतमन्द लोगों की निःस्वार्थ सहायता और सेवा करो, तुम्हारे गुनाह माफ हो जायेंगे और तुम भुने बीज बन जाओगे l
· शासन चुस्त और दुरूस्त रखो, जो कहो उसे लागू करो l
· समाज पहले तुम्हारी जांच करेगा, फिर सुनेगा l
· समाज से बहुत ले चुके अब देने की बारी है l
· आज का समाज अन्धा है, आँख वाले भी चश्मा पहने हैं l
· लगाव का त्याग तो बड़े कठिन अभ्यास और तथाकथित कष्ट सह लेने के लिए तैयार रहना है l
· त्याग की परीक्षा सामग्री उपलब्ध होने पर ही होती है, जिसके पास कुछ है ही नहीं उसे त्याग की भावना की जाँच नहीं होती l
· त्याग प्रेम का जन्मदाता है l
· सिर्फ त्याग से सभी दोष दूर हो जाते हैं l
· त्याग कुछ पाने के लिए नहीं होना चाहिए l
· त्याग तथा करूणा की मदद से जीवन सुखी बनाया जा सकता है l
· त्याग करना है तो पहले सन्तोष को अपनाना होगा, सन्तोष की अनुपस्थिति में त्याग खलता है l
· त्यागी का साथ करने से भी कल्याण होता है l


अघोरेश्वर वाणी :-
दुरनिमित्त का पात्र चोर होता है, चुगलखोर होता है, चमचा होता है, झूठा होता है l दुरनिमित्त का पात्र कलुषित विचार-वाला होता है, कृपण होता है, क्रूर होता है, हिंसक होता है l दुरनिमित्त का पात्र अपव्ययी होता है, वेश्यागामी होता है, कुमारियों या विवाहितों के साथ गमन करने वाला होता है lविधवाओं के साथ गमन करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र अनैतिक होता है, अचारित्रिक होता है l तिलक-दहेज लेने वाला होता है, बेटी-बेचवा होता है, औघड़ और अघोरेश्वर का अपमान करने वाला होता है, अपशब्द बोलने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र गलत आचरण करने वाला होता है, महात्मा-साधु की हिंसा करने वाला होता है, महात्मा-साधु का तिरस्कार करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र अपने कुल में मैथुन करने वाला होता है, गुरूकुल में मैथुन करने वाला होता है, दुरनिमित्तका पात्र माता-पिता का तिरस्कार करने वाला होता है, गुरू-सज्जनों का तिरस्कार करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र राष्ट्र और समाज को धोखा देने वाला होता है, राष्ट्र और समाज का शोषण करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र मुनाफाखोर होता है, तस्कर होता है, जोगा-टोना करने वाला होता है l दुरनिमित्त का पात्र अपने बन्धुओं से झगड़ने वाला होता है, आश्रम में वैमनस्यता फैलाने वाला होता है, आश्रम में एक दूसरे की चुगली करने वाला होता है l ऐसे लोगों का दुरनिमित्त कटता नहीं l ऐसे लोग दुरनिमित्त के पात्र हैं l इनमें सदैव दुरनिमित्त लबालब भरा रहता है l यह पाप का घड़ा जब फूटता है तो दुरनिमित्त ऊपर आ जाता है l उबलता है तो ऊपर आ जाता है l दुरनिमित्त अपकृत्य का निवास स्थान है l दुरनिमित्त को ऐसा ही जानो l


अघोरेश्वर वाणी:- • पहले के लोग झूठ बोलने से, गलत कहने से, भयभीत होते थे l अदालत (न्यायालय) में ईश्वर की शपथ लेते समय वह समझते थे कि हम गृहस्थ है, बाल-बच्चेदार हैं l हम झूठ नहीं बोलेंगे l उसका असर बाल-बच्चों पर होने का पूरा भय बना रहता था l अब के घूसखोर लोगों से यदि कोई सज्जन कहता है कि आयु अल्प है गलतकाम नहीं करना चाहिये, तो घूसखोर लोग कहते हैं कि हम बाल-बच्चेदार हैं, यदि ऐसा नहीं करेंगे तो उनके उदर की भूख कैसे मिटायेंगे ? वे समाज को धोखा देते हैं, राष्ट्र को धोखा देते हैं l
पहले के लोग ऐसा दिखाई देते थे जैसा अब कुत्तों में दिखाई देता है l अपनी पत्नी के साथ सहवास करते थे l अगर्भवती के साथ सहवास करते थे l अपनी स्वजाति में सहवास करते थे l अब यह कुत्तों में दिखाई देता है l अब के लोग अपनों में भी सहवास करते हैं, स्वजाति में और परजाति में भी करते हैं l गर्भवती के साथ भी करते हैं, अगर्भवती के साथ भी करते हैं, रजस्वला के साथ भी करते हैं, अरजस्वला के साथ भी l अब का कुत्ता अपनी कुतिया के साथ करता है l रजस्वला होने पर करता है, अरजस्वला के साथ नहीं, दूसरों के साथ नहीं l अगर्भवती के साथ सहवास करता है, गर्भवती के साथ नहीं l
यह दूसरी बात है कि पहले के लोग दिखाई देते थे, अब के लोग नहीं l अब कुत्तों में यह दिखाई देता है, मनुष्यों में नहीं l अब का मनुष्य गर्भवती के पास जाता है, रजस्वला के पास जाता है l अरजस्वला के पास जाता है l जाति के पास जाता है, परजाति के पास जाता है l कुत्ते की तरह स्वजाति में नहीं जाता l यह कलियुग का प्रथम चरण है l कुत्ता स्वजाति में जाता है, परजाति में नहीं, रजस्वला के पास जाता है, अरजस्वला के पास नहीं l
क्रय-विक्रय और तिलक-दहेज द्वारा जो विवाह सम्पन्न होता है, उस आदमी की भार्या मैथुन-धर्म के लिए होती है, क्रीड़ा के लिए होती है, उस पुरूष के मनोरंजन के लिए होती है l उससे जन्मी हुई सन्तान अर्थ को प्रधानता देती है l धर्म की प्रधानता कभी इससे नहीं हो पाती l इस पवित्र भारत में, इस भूमि पर, वह असुर-पद को सुशोभित करता है l तिलक-दहेज रूपी क्रय-विक्रय के चलते मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता l





अघोरेश्वर वाणी, --
· जहाँ विद्या है, वहाँ विनय है l विवेक, शिष्टता और शील पाया जाता है l जहाँ विद्या थोड़ी होती है, अविद्या अधिक होती है, वहां अशिष्टता होती है l गुरू, शिष्य में वैमनस्यताता होती है l जिस पत्तल में खाते है, उस पत्तल में छेद करते हैं l जिस शिक्षा-संस्था में अविद्या घर कर जाती है, वहाँ द्वेष, कलह, एक दूसरे को नीचा दिखलाने की प्रवृति, एक दूसरे पर आरोप, प्रतिआरोप की प्रवृति दिखायी पड़ती है l
अविद्या प्रपंच है, विद्या प्रपंच-रहित है l अविद्या दूषित वायु की तरह असह्या, अशोभनीय, अपकृत्यगामी होती है l विद्या विनय,विवेक, शीलगामी होती है l ऐसी ही दृष्टि की अभी आवश्यकता है l अविद्यागामियों का संग, दुष्परिणाम होता है, दुःख उत्पादक होता है l यह त्याज्य होता है l
· पाँच बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए---कोई गर्भवती स्त्री रास्ते में हो तो उसे रास्ता देना चाहिये l कोई बोझा लिए हुए मजदूर रास्ते में हो तो उसे रास्ता देना चाहिये l शासक को भी रास्ता देना चाहिये, रास्ते में हो तो l गुरू यदि रास्ते में है तो उन्हें भी रास्ता देना चाहिये l मुर्दा को ले जाते हुए लोग हों, तो उन्हें भी रास्ता देना चाहिये l इन पांच बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये l

· "किसी भी 'ग्रन्थ को ईश्वर-प्रदत्त नहीं माना जा सकता है l यदि कोई ग्रन्थ ईश्वर-प्रदत्त माना जाय, तो उसकी भाषा भी ईश्वरीय ही होनी चाहिए l बोधगम्य भाषा, संसार भर में सर्वत्र एक सी नहीं है…. l




गुरू वाणी
1. मनुष्य देव तथा असुर का मिश्रण है (देवासुर) l
2. बुढ़ापा शरीर की दुर्बलता है l
3. किसी की असलियत, जानकारी उसके चले जाने के बाद होती है l
4. काम की तृप्ति पाप नहीं है, कामी होना ही पाप मोल लेना है l
5. आज शादी का महत्व नहीं है l
6. बच्चे मां-बाप के द्वारा बुरे बनाये जाते हैं l
7. विपत्ति का मारा एकान्त ढूंढ़ता है l
8. अनुपस्थिति से ही मनुष्य की आवश्यकता मालूम पड़ती है l
9. स्वाथ मानव को अन्धा बनाता है l
10. पूँजीपति महात्माओं को भी खरीद लेते हैं l
11. गलती करने वाला पुरूष छिप जाता है तथा दोष नारी पर ही होता है l
12. जब तक भारत का हर परिवार शिक्षित नहीं होगा और जब तक स्त्रियों के दिमाग से ना समझी दूर नहीं होती तब तक देश का कल्याण होना दुष्कर है l
13. सभ्यता याशिष्टता धनी का गुण नहीं है, धनी का गुण है बचाना और बाद में सम्मान l
14. सम्मान देने तथा सम्मानित होने से धनी वर्ग अन्तर समझता है l
15. भगवान बेकार आदमी को पृथ्वी सेउठा ले तो देश का कल्याण हो जावे l
16. बुढ़ापा त्याग की प्रतिमा है जिसमें यह नहीं है वह महासंकट में है l
17. शान्तचिन्त एवं एकाग्रता साहस एवं वीरता की देन है इसे कायर नहीं पाते l
18. पैसे वाले साधु लोगों को भी खरीद लेना चाहते हैं , ऐसा उनके व्यवहार से मालूम होता है, वे प्रेम शायद ही किसी से करते हों, ईश्वर तक को वे पैसे में बाँधना चाहते हैं l
19. जब चरित्र गिर जाता है तो कोई भी साथ नहीं देता शरीर भी साथ छोड़ने लगता है l
20. कोई भी व्यक्ति आपके चिन्तन में सहायक नहीं होता l
21. तुमसे स्वार्थ सिद्ध न होने पर सभी तुम्हारा साथ छोड़ देंगे l
22. अहं ही जीने का कारण है और नाश का भी l
23. गरीबों की मदद मे पीछे यश प्राप्ति की अभिलाषा छिपी रहती है l
24. अपने न देकर, किसी से लेकर देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है l
25. गरीबों को खिला कर बड़ा बनना चाहते हैं लोग l
26. यह कटु सत्य है कि महान पुरूषों के भी छोटे समन्वय होते हैं l
27. जितने भी सम्बन्ध है गलत बन्धन है l
28. दोष इन्द्रियों का नहीं अपना है l
29. प्यार से विष पिला सकते हो, भय दिखा कर दूध नहीं l
30. तथा कथित बुद्धिजीवी और सम्पन्न लोगों ने ही समाज में विषमता पैदा किया है l
31. सभी साथ रहने वाले तुम्हारे नहीं है l
32. मल ही सौन्दर्य और बल है l
33. पुरूष का दोष पानी की लकीर है, स्त्री का दोष पत्थर की लकीर है l

· सबसे बड़ा प्यार माँ का होता है, पर सबको भरपूर प्यार नहीं मिलता l
· माता की याद से ही सफलता आधी मिल जाती है l
· माता को पूरी स्वतन्त्रता होनी चाहिए, उस पर प्रतिबन्ध लगाना होतो ईश्वर से विनय करनी चाहिये l
· ईश्वर माँ के सेवा का अवसर दो l
· बच्चे को रोते देखना माँ की बेबसी है l
· आप मां की पूजा नहीं कर सकते, आप सिर्फ उसके आशीर्वाद और सेवा आनन्द उठा सकते हैं l
· किसी भी कीमत पर माँ का आशीष लो l
1. शुभ कार्य सर्वदा कम ही लोगों द्वारा सम्पादन होता है l
2. भक्ति से आत्मशुद्धि, आत्मशुद्धि से जीवन कल्याणकारी l
3. श्रद्धा निःस्वार्थ की सहचरी है l
4. पूजा के समय मानव देव बन जाता है l
5. आज पूजा ही अनर्थो की जननी बनी हुई है l
6. पूजा से मन शून्यता को प्राप्त हो तो ठीक है, वरना ढकोसला है l
7. देवी को पाने के लिए पक्की निष्टा, सच्ची लगन सच्चा दिल और त्याग ही ऐसे उपाय है l
8. हम किसकी अराधना करें जिससे राष्टीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित हो l
9. गंगा का किनारा सब कुछ दे सकता है यदि आप अपने में रहे l
10. मन्त्र जीवन का आधार है, सिर्फ साधना नहीं l
11. जप समय का आधार है l
12. आज का व्रत तो मनोरंजन हो गया है l
13. देवी के स्थान पर जाने से कल्याण नहीं होगा l
14. नवरात्र समय काटने के लिए मत करो l
15. पवित्र स्थान पर मानसिकता का बदलाव सम्भव है l
16. बार-बार सपन्दन से मन्त्र जागृत होता है l
17. पूजा मिलने की प्रक्रिया है और अर्पण समर्पण है l
18. अच्छे विचारों का अनवरत उठना दैवीय गुण है, देवत्व है l
19. निश्चय ही लौकिक आकर्षण समाप्त होने पर ही दैवीय आकर्षण सम्भव है l
20. सचमुच यदि देवी सामने आ जाय तो टकटकी लग जाय, जबान बन्द हो जाय और इच्छायें समाप्त हो जायें उसका स्वरूप आपके अन्तर्मन का स्वरूप है l
21. जो तुम्हारे अन्दर है उससे समर्पित होकर मिलो l
22. ध्यान एक रोग है, जिसकी दवा दर्शन है l
23. सब काम सभी नहीं कर सकते साधना भी कुछ ऐसी ही है l
24. बड़ा ही आश्चर्य है, निराकार ब्रह्म की जानकारी साकार ब्रह्म से होती है l
25. निष्काम चिन्तन का अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है l
26. शक्ति अर्जित करना होता है l
27. नवरात्र साधकों के लिए नहीं भक्तों के लिए है, साधकों के लिए कोई समय अलग नहीं ता l
28. नशा से की गई साधना में एकाग्रता नहीं हो सकती l
29. मन्त्र सबसे बड़ा नशा है l
30. साधक को कभी भी परेशानी में मन्त्र का जाप नहीं करना चाहिए, इससे मन्त्र की शति क्षीण होती है l
31. पूजा करने का भी एक ध्येय होना चाहिए, जिसको चाहते हैं वह मिले तथा शान्ति मिले l

Thursday, November 12, 2009

फोटो गैलरी ,गुरू वाणी, mangaldhanram

· स्वर्ग तो एक कल्पित बात है कल्पना का जगत है हमारा स्वर्ग तो यही है l जो कुछ स्वर्ग में वर्णित है कल्पना में हम सब यहीं पाते है l अगर हम शान्त है l हमारा परिवार शान्त है सब खुश है सब विभोर हैं lसब आर्थिक, दृष्टि से सम्पन्न हैं l सब धार्मिक है तो स्वर्ग दूसरा नहीं होता यहीं स्वर्ग है l कल्पना करते है इसलिए बहुत ऊँचा मालुम पड़ता l
और नरक यही है हम सब कुछ सोच नहीं सकते है l बैठ नही सकते है चल सकते है बुद्धि विकृत है l परिवार दुःखित है लड़के कही और है बीबी कही और है बेटा कुछ कहता है माता कुछ कहती है मालुम पड़ता है कि नरक है l तो ये कुछ दुर नहीं है कल्पना में कुछ भी कहो बहुत ज्यादे कही जाती है जिसने देखा नहीं स्वर्ग और नरक देखा नहीं कल्पना ही है तो लोग उसके बारे में बहुत कुछ कहेंगे l
किसी ने गाय नहीं देखा हो l उसके बारे मे वर्णन पढ़ा ही हो तो गाय के बारे में वह पूर्णरूप से समझ नहीं सकता लेकिन जिसने गाय एक बार देखा तो गाय कहते ही गाय के बारे में जान लेता है उस तरह से वह स्वर्ग है तुम देखो l निश्चिन्त हो एकाग्र हो बच्चे सुखी है l बीबी प्रिय हैं l माता आदर देती हैं पिता हर परिश्रम करके उचित उपार्जन करता हो, धार्मिक हो l यही स्वर्ग है l इसी का वर्णन लोगों ने पुस्तक में बहुत ऊँची-ऊँची भाषाओं में किया है l
और यही नरक है l स्वर्ग और नरक इस शरीर के बाहर जाने के बाद नहीं होता l क्योंकि संशय से ही जीवन मृत्यु भोग और कर्म की बात आती है संशय से मुक्त हो जाओ तो सब ठीक है l तुम मुक्त हो l
· ये चूँकि भिन्न-भिन्न लोग हैं किसी चीज को हम कुछ समझेते हैं आप कुछ समझेते हैं l हमारी बात को आप मिथ्या कहते हैं आपकी बात को हम कहते हैं संसार में मिथ्या नाम की कोई वस्तु नहीं है l झुठ कुछ है नहीं l सब सत्य है झूठ कहने के लिए है करने के लिये नहीं है सत्य आचरण के लिये है झूठ कहने के लिये है l l झूठ कुछ है नहीं l सब सत्य है झूठ कहने के लिए है झूठ का आचरण नहीं होता है l सत्य का आचरण होता है सत्य आचरण में निबद्ध हो l झूठ वाद-विवाद में निबद्ध है l झूठ का कोई आचरण नही है l झूठ बोलने के लिये है l झूठ कहने के लिये है l झूठ समझाने के लिये है सत्य व्यवहार के लिये है l


· अहिंसासा कायरता नहीं है किसी को नहीं मारना अहिंसा नहींहै l अहिंसा है अपने अन्दर इस तरह के भाव उत्पन्न नहीं होना l जिसको हमें बार-बार दबाना पड़े l बार-बार अपनी भावनाओं को कुत्सित मत कर दबाना विकृत विचार उठना ये सब जब होते है l मनुष्य उनको दबाने कीकी बात सोचता है ये हिंसा है l हम लोगों को चाहिये ऐसा भाव ही उत्पन्न न हो कि विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न हो l ये अहिंसा की बुनियाद है l
अहिंसा तभी होती है l उन भावनाओं पर जिनको हमें फिर दबाना नहीं है l उन भावनाओं पर जिनको हमें फिर दबाना नहीं पड़े l जब कभी दबाते हैं चाहे कुकृत्य हो, दुष्कर्म हो उसे नहीं विचारते l अहिंसा का आधार ही वही है l जहाँ कि हम हिंसा का नाम ही भूल जाते हैं l कोई भी दबाव मानसिक हो बाहरी, हमको न करना पड़े l और ये तभी सम्भव है और उसी आदमी से सम्भव है जो निष्काम हो और ममता न हो लोभ न हो l स्वार्थ की भावना सीमित हो त्याग की भावना हो l बलिदान की भावना हो दूसरे की लेने की भावना न हो l दूसरे के कुकृत्य या दुष्कर्म देखने को भावना न हो किसी को कटाक्ष करने की भावना न हो l निन्दा न सुनने की, न कहने की भावना हो ऐसे लोगों में ही अहिसा की बुनियाद होती है l अब तुम लोग सोच सकते हो कि कितने लोग अहिसक हो सकते हैं और बारे में सोचते हैं और अहिंसा का तो मजाक है ''अहिंसा परमो धर्मः''l
धर्म नाम व्यवहार का है तो अहिंसा पर हम उतरते हैं और व्यवहार पर उतरते हैं तो अजीब सासा अलग सा लगता है शाब्दिक किसी को मारने का जहाँ तक सम्बन्ध है जिस पृथ्वी पर हम खड़े हैं जहाँ हमारा पैर पड़ता है न मालुम कितने जीव उसके नीचे है l पैर के नीचे चलते समय कितने जीव-जन्तु मरते हैं कहो कि अहिंसा है ये तो हिंसा नही है l धर्म व्यवहार है व्यवहार है और वही धर्म है और तभी अहिंसा की बात होगी l धर्म व्यवहार का नाम है l धर्म आचरण है धर्म ऐसी वस्तु नहीं है किकि जिसका सिर्फ उदाहरण दिया जाय कि धर्म यह बात है धर्म वह बात है धर्म ऐसे करना चाहिये l इस तरह का कोई धर्म नहीं जो हम सरलता से व्यवहार कर सकें l जिस व्यवहार से हमें खुशी हो l आनन्द हो l कभी दुःख उत्पन्न न हो l वही व्यवहार है तब शायद हमारे उस व्यवहार से लोगों को तकलीफ मालुम होती हो l सारी विपरीत परिस्थितियाँ हमारे सामने आ जाय सम्भव है फिर भी हम खुश होंगे l क्योंकि हमारा आचरण जो है हमारे अनुकूल है l सुखदाई है हमें उससे दिक्कत नहीं है धर्म हुआ और तभी ऐसा सम्भव है l जब हम व्यवहार में इतना स्वच्छ रहें इतना स्पष्ट रहें कि दुनियाँ को अपने आस- पास के लोगो को किसी की परवाह किये बिना कौन हमसे खुश होता है कौन दुःखी होता है इसकी परवाह किये बिना हम अपना धर्माचरण करें l सारा समाज विरोध में हो जाय l सारी दुनियाँ विरोध में हो जाय अगर हमारा व्यवहार हमारा आचरण हमारी सच्चाई ठीक जगह पर है तो कभी न वो लोग वश में होंगे फिर नहीं भी हो तो हमारा क्या जाता है कभी भी धर्माचरण दूसरों को देख के नहीं होता है अपने अन्दर देख के होता है l और इस तरह से अहिंसा की बात लोग करें l

· गरीब अपने पर भी विश्वास नहीं करता l
· सफल कार्य प्रणाली में विश्वास के साथ धैर्य आवश्यक है l
· दुःखी की सहायता के लिए सर्वदा तैयार रहो l
· मृत्यु कभी भी असमय नहीं होती l
· असहाय वह है जो खुद को नहीं पहचानता l
· आचरण रहित व्यक्ति नीचे देखकर बातें करता है l
· प्यार में पला हुआ मनुष्य दृढ़ तथा सबल होता है l
· कठिनाई से मनुष्य को सबल बनने की प्रेरणा मिलती है l
· वासना के उत्पत्ति का अवसर न दें l
· भ्रष्टाचार का एकमात्र उपाय संगठित प्रयास है l
· पति-पत्नी को मित्र की तरह रहना होता है l
· दुःखी तथा क्रोधी मनुष्य से सुख तथा शान्ति की आशा गलत है l
· आवश्यक काम बिना हुए नहीं रहता l
· राम का अर्थ है समदर्शी, न्याय रक्षक तथा त्यागी l
· रोगी के पास स्वस्थ एवं खुशदिल मनुष्य को रहना चाहिए l
· बड़ों का कभी भी अपमान नहीं होता l भय छोड़ कर भगवान बन जाओ l
· पिता का एक वचन भी जीवन भर सहायक बना रह सकता है l
· प्रेम अमर है, बदलता नहीं बदल देता है l
· असहाय तुम्हारी मदद चाहता है l
· रोगी के लिए दवा विश्वास का जन्मदाता है l
· बीमार होने से भी फायदा होता है l
· कभी-कभी बुद्धि भी साथ नहींदेती, यही होनहार है l
· रूपया से समय अधिक कीमती है l
· ईर्ष्या एक महान रोग है l
· क्रोध सामने वाले में वास करता है l
· सत्य की विजय होती है, परन्तु परिश्रम से थक जाने के बाद बिल्कुल अन्त में , इतना इन्तजार सब नहीं करते, इस वास्ते आज इसका अभाव नजर आता है l
· योग्यता मरते-मरते भी मनुष्य को उच्चतम स्थान दिला सकती है l
· आतताईयों का मुकाबला करना सामाजिक तथा धार्मिक काम है l
· सूर्योदय के पहले निशा अवकाश प्राप्त कर चुकी होती है l
· कभी-कभी वस्तुओं का अपहरण या विनाश भी सन्तोष पैदा करता है , पर वह तो लाचारी होती है, सन्तोष नहीं lश्रम करना ठीक है l
· श्रम पर श्रद्धा होनी चाहिये तो आनन्द मिलता है, पैसा भले ही न मिले l
· परिश्रम का महत्व जीवन में बहुत बड़ा है , हर रोज थक जाने तक शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए , अगर थक जाने पर शारीरिक श्रम नहीं मिलता तो यह मनुष्य का दुर्भाग्य है l
· यदि मनुष्य आलस्य करे तो कोई भी वस्तु लाभ्य नहीं है l
· अपनी मान्यता के अनुसार मनुष्य मनोकामना सफल करता है l
· अधिकतर लोग खुश करने के लिए ही किसी की शिकायत करते हैं, जबकि उस शिकायत से वे भी वंचित नहीं है l
· भगवती रक्षा करे जब गलत लोगों का साथ हो जाय या जब गलत विचार पैदा हो जाय l
· जब भी भेद पैदा हो जाय तो तुरन्त उसका परित्याग करना चाहिये, जिससे भेद हो l
· अगर किसी को बड़ा मानें तो उसकी बातों पर ध्यान देना होता है, वैसे किसी को बड़ा मानने की जरूरत नहीं होती, सिर्फ कहना मानना ही बड़े को खातिर देना नहीं होता, इसके बाद भी एक ऐसे भाव की जरूरत होती है जो खूब भीतर से उसका आदर करे यह बड़ा मानने वाले का गुण है l
· अक्षर का मतलब जिसका कभी नाश नहीं हो , अक्षर का ज्ञान सब चाहते हैं, उस अक्षर का ज्ञान जिससे शब्द बनते हैं परन्तु उस अविनाशी का ज्ञान नहीं हो पाता l
· कभी-कभी अपने नजदीक के लोगों को कष्ट देकर भी सहयोग करना पड़ता है l
· प्रकृति ने जीवन सरल बनाने के विस्तृत साधन दिये है पर पुरूष उसका उपयोग समय पर नहीं कर पाता l
· क्या आपके वर्तमान आचरण से आप और आपका समाज सन्तुष्ट है l
· किसी से कुछ कहना व्यर्थ है, नुकसान सह कर भी चुप रहना अच्छा है l
· अपने सन्तानों को बनाने के लिए आपको बुरी आदतें छोड़नी होगी l
· शिक्षा और सम्पत्ति मिलकर मानवता को विनाश के कगार पर ले जा रही है, इससे बचने के उपाय क्या हो सकते है l
· लोग तुम्हारे बाहरी विकास से प्रभावित होते हैं उनको तुम्हारे अन्तः करण से क्या मतलब l
· जो लोग तुम्हारे साथ होने का दावा करते हैं, वह स्वार्थपरस्त है l
· लोग तुम्हारे विकास से प्रसन्न नहीं होते हैं, वे स्वार्थ की आशा से प्रसन्न होते हैं l
· किसी भी आदमी में सिर्फ अच्छाई या बुराई नहीं होती, दोनों होती है l
· सिर्फ कपड़ा या पैसा देकर गरीबी दूर नहीं की जा सकती l
· बहुत से लोग दया का दुरूपयोग करते हैं l





· लोग तुम्हारा इन्तजार करते हैं, कुछ लेने के लिए क्योंकि उनके पास देने को कुछ है ही नहीं l
· आदमी बदल सकता है, पर समय आने पर l
· कभी-कभी सुधारके लिए दण्ड जरूरी होता है l
· आज कोई राष्ट्रीय त्यौहार नहीं रह गया l
· तुम अपने पर विश्वास नहीं करते और यही दुःख है l
· शरीर सोता है, मन नहीं सोता l पढ़ने और सीखने में अन्तर है l
· तुम्हारे साथ वादा करने वाले कई हैं, करने वाले एक दो l
· आप सीखे ही नहीं तो सीख क्या देंगे l
· अच्छा दीखने और अच्छा दिखाने में अन्तर है l
· मूर्ख अपनी जिम्मेदारी नहीं समझता l
· आदेश दो तो पालन कराने की क्षमता भी रखो l
· समर्पण का अर्थ है विवादरहित होना l
· किसी का इन्तजार अच्छा नहीं है l
· विद्धालय के झगड़े का कारण शिक्षकगण होते हैं l
· बहुत से लोग पद पर रहने पर ही संस्था में रहते हैं l
· सिन्दूर कुमारी में बिजली का काम करता है l
· आज की सरकार तो कागज पर चलती है कागज से सावधान रहें l
· गुमराह लोगों को अपने लाभ हानि का पता नहीं होता l
· सामने वाला बुरा है तो तुम क्या उससे अच्छे हो l
· व्यवहार और कानून में स्पष्ट अन्तर होता है, पर कानून तो कानून है l
· तुम्हारा अन्त क्या होगा, सोचो l
· मदद किससे और क्यों चाहते हो सोचो l
· गरीबी अपने को पहचानने नहीं देती l


‘चारो कुतिया राम के करे भजन में भंग l
इनको टुकड़ा दे के करे तब सत्संग ll ‘
अघोरेश्वर वाणी, गुरू - वाणी
· सेवा वृत्ति से दृष्टि दोष खतम हो जाता है l
· सर्वप्रथम उसका ख्याल रखिये जो आपकी सेवा करते है l
· सेवा-भाव से प्रेरित वह कर्म है जो कुछ कर्म करके आन्नद लेने का मार्ग प्रशस्त करता है l
· स्वशरीर सेवा-शरीर को इस भाँति रखने की क्रिया l जिससे शरीर का विकास हो तथा स्वस्थ रहने का विश्वास पैदा हो l नियमित जीवन, सामयिक तथा सन्तुलित आहार-बिहार नित्य अपने कर्मो का अध्ययन प्रमुख क्रियायें है l सन्निकट लोगों की सेवा-जिसमें परिवार, साथी सहयोगी, अन्य समाज के लोग जिनका साथ है ही इन सेवाओं में दक्ष लोग, ही गुरू भगवान की सेवा में सफलता प्राप्त करते हैं l
· समाज में काम करना और आत्मलीन रहने में एक बड़ा ही संघर्ष है जो प्रत्यक्ष है l यदि समाज में रहना है तो समाज को अपने अनुकूल बनाना होगा और नहीं तो सामाजिक दुर्दशा में घुटना और मरना होगा l
· भारतीय समाज सिर्फ पुरूषों का है l
· समाज सुखी रहेगा तभी मैं भी सुखी रहुँगा l
· बुरे समाज में जीने से समाज रहित रहना ठीक है l
· समाज की कुरीत्तियाँ आत्मा को पसद नहीं l
· जनता देश की आत्मा है इसे सन्तुष्ट रखना होगा l
· मजदुर को पूरी मजदूरी के साथ पूरी प्रतिष्ठा दो l
· धन चाहे जिस तरह एकत्र किया जाय वह सामाजिक अभिशाप है l
· शिक्षा समाज के लिए है, व्यक्ति के लिए नहीं l
· गलत तरीको को बदलो, नहीं तो समाज छोड़ दो l
· समाज को लोकसेवक रखने होंगे l
· शासन की कमजोरी से निरीह जनता धाँधली की चक्की में पीस दी जाती है l
· आज की पुलिस भक्षक है l
· असहाय की सहायता करना अपनी सहायता करना है l
· व्यक्तिगत कार्य से अधिक महत्व सामाजिक कार्य की है l
· सरकारी कर्मचारी के सामाजिक नहीं होने से शासन बदलता है l
· आज जन जागरण करना ही सामाजिक धर्म है l
· जहाँ ग्रामवासी एक हो जाते है, वहाँ स्वयं एक सरकार बन जाती है l
· धन से समाज पर शासन करना असम्भव है l
· राजनीति अन्थी नहीं है, तुम अन्धे हो l
· अगर मजूदर को भोजन नहीं मिलता तो क्रान्ति कमजोर पड़ जाती है l
· शासन की कड़ाई अपने तरीके पर होनी चाहिए न कि आदमी पर l
· समाज अन्धा है तथा अन्धे की तरह ठोकर मारता है l
· जनता की भलाई करने वाला जनता को ढूँढता नहीं l समाज का रूप बदलना हो तो स्वयं बदलो l
· जब तक समाज मे नारी शिक्षित नहीं होगी, परिवार सुखी नहीं बन सकता l

· यह शरीर तुम्हारे चाहने वालों द्वारा ही दफनाया जायेगा l

· कोई एक ही चीज ढूँढो l

· पैसे की कमी से परिवार में कलह बढ़ता है l ऐसे अवसर पर सबको अपने पर दबाव डाल कर सच्ङित भाषा का उपयोग करना चाहिए l

· किसी कार्य में विश्वास के साथ हाथ बंटाने से सफलता मिलती है l

· किसी काम के करने का तरीका काम करने से आता है, सुनने से ही नहीं आता है l

· सर्वदा प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति बड़ा से बड़ा कार्य अति सुगमता से कर सकता है l इसलिए मनुष्य की प्रथम खोज प्रसन्नता की होनी चाहिए ऐसी प्रसन्नता जो छूटे नहीं l

· मानव जीवन का एक अभिन्न अंग अध्ययन है , अध्ययन से बुद्धि एकाग्रता को प्राप्त होती है l अध्ययन से कर्मक्षेत्र के दुविधाओं से निबटने की शक्ति मिलती है l एकाग्र व्यति विश्व शक्ति की ईकाई है l

· मनुष्य को अकेला ही काम करना है l यदि मनुष्य हो तो अकेला रहना, अकेला चलना, अकेला करना सीखो l यदि एक ईश्वर सब कुछ है तो तुम अकेला भी चल सकते हो l

· किसी भी चीज की असलियत जानने के लिए उसके निकट जाना आवश्यक है l परिस्थिति का अन्दाज भी उस परिस्थिति में रह कर मनन करने से होता है l कोई भी मनुष्य साधारण नहीं है l अवसर पहचान कर जागरूक मनुष्य असाधारण काम कर सकता है l

· कार्य में लगे हुए व्यक्ति को ही सहायता मिलती है , विचार सहायक की आवश्यकता भी नहीं पड़ती l

· अपना विश्वास तथा आत्मबल ही सफलता की जड़ है l

· अगर कार्य ठीक है तो आज या कल उसे होना है l देर या सवेर l प्रयास तूफानी गति से चलाना चाहिए l

· मनुष्य का कोई भी प्रयास विफल नहीं जाता , प्रयास लगन से करते रहना ही सफलता है l

· जीवन में एकान्तवास का बहुत बड़ा महत्व है l एकात में मनुष्य अकेला नहीं रहता l वह ईश्वरीय शक्ति से विमर्श करता है l

· मन एक है, इसे एक कर्म मे लगाना ठीक है l

· किसी भी कार्यक्रम को लगातार चलाने से सफलता दीख पड़ती है l बीच में समय दूसरे कार्य में देने से उस कार्य मे शिथिलता आती है l

· निश्छल मनुष्य ही निर्भय होता है l

· ईश्वर पर पूर्ण विश्वास करने वाला निश्छल होता है l

· एकात रहने से मानसिक बल मिलता है l

· आत्मा दूसरे को सम्मान देने से सम्मानित होता है l

· अपने सम्मान के प्रयास से घमंड या अभिमान पैदा होता है और आत्मा का प्रकाश क्षीण होने की सम्भावना बनी रहती है l

· मनुष्य जीवन में बड़ी-बड़ी समस्याओं पर भी सुस्ती से काम बिगाड़ देता है l कभी-कभी बहुमूल्य अवसर भी खो देता है l

· बेकार रहने से बुद्धि तथा बल घटता है l

· एकान्तवास जीवन को उच्च तथा शान्तिप्रिय बनाने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है l किसी भी कीमत पर कुछ समय एकान्त में व्यतीत करना वायु के इतना आवश्यक है l



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· क्या सोचते हो, सब निश्चित है करते रहो l
· मन न चले इसकी भी एक कला है, सीखो (शान्त) l
· जो शुरू किये हो उसे पूरा करो, वरना बहुत कुछ अधुरा रह जावेगा l
· क्या करना, क्या नहीं करना असमंजस है, असमंजस में मत रहो l
· कल की तारीख व दिन जानने के लिए आज के तारीख व दिन का ज्ञान आवश्यक है l ठीक इसी तरह कल बनाने के लिए आज पर विचार आवश्यक है l
· किसी के जीवन में एकान्तवास और शून्यता आवश्यक है l
· जिसने पिछली घटनाओं से कुछ सीखा नहीं उसे कठिनाई का सामना करना पड़ेगा l
· जीवन में विश्वास तो मनचाही बात की पूर्ति से होता है l
· जीवन को व्यवहार में उतारो, हवा में मत सोचो l
· साथ वाला क्या सोचता है क्या कहता है, सोचो l
· ऐसा काम न करो जिसे बाद में भूलने की कोशिश करनी पड़े l
· भय कमजोरी है, यह तुम्हें विचलित करता है l
· अपने में रहने से आयु बढ़ती है l
· शरीर को मन से अलग रखो l
· सबसे अधिक और ठोस सीख तो मनुष्य को अपनी करनी और रहनी से ही मिलता है l
· सभी लगाव अस्थाई हैं पर जीवन में गम्भीर परिवर्तन लाने में सक्षम है l
· गन्दा व्यवहार सबसे पहले गन्दा करने वाले को प्रभावित करता है, बाद में औरों को l
· आतुरता भयानक है चाहे वह जिस परिस्थिति में हो l
· दूसरे के भरोसे किसी काम की शुरूआतत मत करो अपने सामर्थ्य पर ही भरोसा करो l
· चुप रह कर देखो, प्रकृति पर विश्वास बढ़ेगा l
· कुछ कहना है तोसिर्फ एक से कहो वही सुनेगा l
· मन में प्रश्न न उठना शान्त चित्त का लक्षण है l
· अपने कर्मो में विश्वास करो, क्षमता बढ़ती है l
· लक्ष्य सही होने पर मार्ग मिल जाता है l समय को पहचानो न देर करो न जल्दी l
· प्यास से भी आदमी मरता है और पानी में डूब कर भी , पानी, की अधिकता और कमी दोनों खराब है l समरस की कामना करो l
· जो कार्य खुद नहीं कर सकते उसे दूसरों को करने की शिक्षा मत दीजिए l
· प्रातः उठने से पहले शान्त रहिये l
· अपने रहने और चलने का तरीका खुद बनाओ l
· अपने को समझने के लिए आकाश की ओर देखो l
· जो तुम देखते हो, वह कह नहीं सकते l
· काम करना सिखावो आराम करना नहीं l
· किसी का भरोसा मत करो तुम अपना काम स्वयं कर सकते हो गौर से देखो l
प्रमाद वाले मनुष्य पृथ्वी के भार होते हैं l पृथ्वी का अन्न-जल ग्रहण करके, पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को क्लेश देने वाला, भार-स्वरूप होता है l ऐसे मनुष्य का नारकीय जीवन दुश्चरित्रता में, नरक में बीतने सरीखा होता है l मनुष्य को प्रमाद पीछे ढकेल देने वाले सरीखा होता है, मल-मूत्र में पड़े सरीखा होता है l विकृति का दूसरा नाम प्रमाद है l
“देने को टुकड़ो भलो, लेने को गुरू नाम l
इस भव में आई के, कर लीजै दो काम ll “
· तू न भगवान बनो, न भगवान का प्रतिनिधि l अपना प्रतिनिधित्व करने में तुम जुट जाओ l बहुत भय है कि कहीं अपने आप से अलग न हो जाँय l बहुतेरे मनुष्य प्राणियों को अपने आप में नहीं देखता l एक क्षण भी अपने आपके पास नहीं ठहर पाते l सुबह चल रहे हैं, शाम चल रहे हैं, सोने में चल रहे हैं, जागने में चल रहे हैं, चलते में चल रहे हैं l कोल्हू के बैल की तरह अपने आप से दूर हो जाते हैं l इसका बहुत भय है l
· पशु और मनुष्य के बीच एक विशेष अन्तर यह है कि मनुष्य अपने स्वभाव, विचार और चिन्तन को बदल सकता है, जो पशुओं के लिये असाध्य है l मनुष्य में और पशु में इतना ही अन्तर है l मनुय गलत काम करता है और बार-बार करता है l वह खुद ही अपने आपको माफ नहीं कर सकता l अपने आपकी अवहेलना के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता l
· चेहरे की सुन्दरता भाव पर है, सफाई और पाँलिश पर नहीं l

· जग का कारण शिव ही है, सार्वभौम सत्य है l

· मुर्ख वह है, जिसको अपने हानि-लाभ का ज्ञान नहीं है l

· घटनायें सदा कुछ दे कर जाती हैं l

· मानव जीवन में किसी की सहायता की जरूरत नहीं है अगर वह नियमित है, अगर कोई साथी मिल भी जाय तो निश्चित रूप से उसे स्वच्छ और दृढ़ विचार वाला होना चाहिए अन्यथा संकट ही होगा l

· विश्वास से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, अविश्वास से पाप शरीर में डेरा डाल देता है l

· सत्य शून्य होता है, सून्य में ही सब पैदा होता है और सब विलीन हो जाता है , अतः शून्य ही सब कुछ है l

· कर्म बन्धन है l

· मनुष्य को शंकर के गले का नाग होना चाहिए, जैसे कि नाग कीचड़ में से निकलकर भी स्वच्छ व निर्मल होता है l

· आदमी कितना नासमझ है जो पाकर भी नहीं समझता कि हमें क्या मिला l

· वहाँ मत झुको जहाँ सभी झुकते हैं, झुकना हो तो झुकने की जगह बनाओ l

· वाणी के अनुसार ही व्यवहार बदलता है, बोल देने के बाद वाणी ही तुम्हीरी मालिक बन जाती है और और फिर उसमें सुधार करना कठिन है, इसलिये वाणी पर नियन्त्रण रखो l

· मनुष्य भगवान से बहुत कुछ मांगता है, उसे मिलता भी है पर वह उसको नहीं जानता है और किस चीज से उसे लाभ है उसे नहीं मालूम है इसी समस्या को लेकर भक्त शिष्य व श्रद्धालु सभी परेशान है l

· जो भी आदमी दूसरों की भलाई के लिए काम करता है उसके सब गुनाह माफ हो जाते हैं l

· जो धन किसी तिजोरी में जमा हो वह धन नहीं लोभ है l

· जो एक के पास से दूसरे के उपयोग के लिए जाय वही धन है और उतना ही धन है l

· नक्सलवाद की उत्पत्ति नागरिकों के आम समस्या पर ध्यान नहीं देने के कारण ही है, ईसमें सरकार ही दोषी है l

· आज का लोकतन्त्र बहुत ही कमजोर हो चुका है, क्योंकि दलों ने नैतिकता खो दी है , इससे राष्ट्र के साथ-साथ दलगत हित का भी नुकसान हुआ है l

· मनुष्य कहीं भी जाय तो इस बात का ख्याल रखे कि उसके एक दिन के आचरण का प्रभाव लोगों के दिमाग में उसके जीवन के लिए अमिट छाप छोड़ देता है l


· आसुरी शक्तियों का होना बहुत जरूरी है लेकिन उसका उपयोग खतरनाक है l

· पुराना स्थान छोड़ने पर ही नया स्थान मिलता है, कुछ पाना है तो कुछ छोड़ना होगा; देखो जिसने छोड़ा वही पहुँचा l

· जमीन शुद्ध या अशुद्ध नहीं होती, जहाँ पर भी सन्त का चरण पड़ जाय अथवा यन्त्र-तन्त्र की स्थापना हो जाय वही स्थान पविज्ञ हो जाता है l

· सज्जन पुरूष की पहचान चेहरा तथा वाणी है l

· आश्रम एक आवश्यकता है l

· सच्चा मनुष्य आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है l

· तुम्हारे हितैषी हैं, जरूरत पर सामने आ जायेंगे l

· क्षमा करने की क्षमता प्राप्त करो l

· नशा तो जीवन का रास्ता ही बदल देता है, इससे बचिये और बचाइये l

· क्या अपने कार्य का रोज आंकलन करते हो ?

· नवयुवक यदि विवेकी लोगों का साथ करें तो उनका और समाज का उत्थान जल्द ही सम्भव है l

· मनुष्य स्वयं ब्रह्म है l

· माँगों मत, लेने के काबिल बनो l

· तुम किस लिये आये हो समझो l

· किसी के पास जाने से पहले उस पर विश्वास करना होगा l

· सशक्त के अग्रसर होने में कहीं भी रोक नहीं होता l

· न सभी गुरू के पात्र हैं, और न सभी मनुष्य शिष्य के पात्र है l


· बच्चों के कार्य पर, उनकी बातों पर पुरा विचार करो l
· परिवार नारी का नहीं बच्चों का होता है, बच्चों के लिए होता है, बच्चों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा आवश्यक है l
· बच्चों को प्यार देना चाहिए पर उनके विकास के लिए थोड़ा सख्त भी होना चाहिए l
· बच्चों को अपने कुल और परम्परा को अवश्य बतायें l
· बच्चों को स्पष्ट बोलने की छूट होनी चाहिए जो बच्चा साफ नहीं बोलता, वह भीतर ही भीतर कमजोर होता है l
· बच्चों की आँखों में देखो l
· बच्चों पर नाराज होने से पहले अपना बचपन याद करो l
· बड़े लोग छोटे लोगों को गलत काम करने का प्रोत्सान देते है l
· बच्चों को निरंकुश छोड़ना देश के साथ खिलवाड़ करना है l
· बच्चों को व्यवहार दो, शिक्षा नहीं l
· बच्चों के अच्छे या बुरे संस्कार के लिये माता-पिता जिम्मेदार है l
· बच्चों को दण्ड देकर आप सच्चाई नहीं जान सकते बल्कि दण्ड देकर उनको झूठ बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं l
· अच्छे और गलत व्यवहार को बच्चे भी समझते हैं l
· जहाँ तक बच्चों के लिए बिगड़ने या बनने का सवाल है यह वातावरण और साथ पर निर्भर करता है l माता-पिता को बड़ी सावधानी से इनके वातावरण और साथ पर निगाह रखना चाहिए l यदि बच्चों को ठीक बनाना है तो अपने अन्दर की भावनाओं पर भी नियन्त्रण रखना होगा l बच्चे उसे पढ़ लेते हैं l बच्चों के भगवान तो माता-पिता ही है l ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और अहंकार से भरा मानव अपनी ओर नहीं देख पाता l इसी मानसिकता में बच्चे पलते हैं l आधुनिक शिक्षा से बच्चों को बाहरी दुनिया की जानकारी होती है, पर अन्तःमन की जानकारी नहीं होती जहां अच्छाई और बुराई का मापदण्ड है l
· बच्चों की शिक्षा में किताबी ज्ञान के अलावा चरित्र का ज्ञान देना आवश्यक है l और साथ-साथ यह भी बताना आवश्यक है कि चरित्र के बिना किस तरह का नुकसान होता है l

· न्याय के लिए स्वयं बलि देना पड़े तो भी सस्ता है l
· अन्यायी का नाश किसी भी तरह करना धर्म है l
· न्याय के लिए इन्तजार करना पड़ेगा l
· अन्याय के खिलाफ अन्याय करना भी न्याय का रास्ता है l
· न्याय दबाने से दबता नहीं है l
· अन्याय के विरूद्ध लड़ना ही युवक का धर्म है l
· अन्याय तो निर्बल पर होता है l
· अन्याय का विरोध ही जवानी है l
· अधिकारी की मानसिकता सही नहीं होने पर न्याय की आशा करना अंधापन है l
·
· अभ्यास न करने से चित्त निकम्मा हो जाता है l चित्त के निकम्मा होने से जीवन निकम्मा हो जाता है l अभ्यास करने से जो परोक्ष है वह भी प्रत्यक्ष हो जाता है और जागृत, स्वस्थ, सबल हो जाता है l अभ्यास न करने से आलस्य, निद्रा और जम्हाई ये तीनों अल्पायु कर देते हैं, मौत के नजदीक ले जाते है l अभ्यास करने से जीवन महान कल्याणकारी होता है l मै ऐसा ही समझता हूं l
· संयमी जीवन सुख देने वाला, शान्ति देने वाला होता है l संयमी जीवन परमार्थ की पगडंडी पर ले जाता है l मैं ऐसा ही समझता हूं l जिसका जीवन असंयमी है/ वह शोकातुर है, कलुषित काया है l संयम रखना चाहिये l जिसका जीवन संयमी है वह साधु है l चचल-चित भटकत दिन राती l' उसको कुछ नहीं सुझता है l जिसका जीवन संयमी है उसको सब कुछ सूझता है l ऐसा ही मै समझता हूँ l




जिस कृत्य के करने से कीर्ति उत्पन्न हो, उसे करना चाहिये l जिस कृत्य के करने से अपकीर्ति उत्पन्न हो, उसे त्यागना चाहिये l कहो, अच्छे फलदायक कृत्य क्या हैं ? बहुतेरों के अवगुणों को न जानना, न देखना, न सुनना, ये फलदायक कृत्य हैं l कहो अपकीर्ति क्या है ? बहुतेरों की बुराइयों को सुनते रहना, आदर्शहीन आचरणों को देखते रहना, दम्भी के पूजा-पाठ को सुनना, देखना और धारण करना अपकीर्ति उत्पन्न करता है l इस तरह का श्रम, व्यायाम स्वस्थ फल को देने वाला नहीं है l जितने लोगों को जितनी अधिक जानकारी होगी, वह तुम्हारे मस्तिष्क को दबाव दे सकती है, प्रफुल्लित नहीं कर सकती, स्फूर्ति नहीं दे सकती, उत्साहित नहीं कर सकती l इससे बचना चाहिये, ऐसा ही जानना चाहिये l


· तुम खड़ा होना सीखो, ठहरना सीखो l
· जो खुद को नहीं पढ़ता, वह क्या पढायेगा l
· क्षमता से बाहर मत सोचो, मत करो l
· आप प्रयास करें थके नहीं, वह अथक प्रयास चाहता है l
· किसी तरह दिन काटना ठीक नहीं है, वह तो कट ही जावेगा l
· अपने से निर्णय लेना सीखो l
· किसी के भरोसे मत बैठो l
· आज की छोड़ कल की मत सोचो l
· समर्पित व्यक्ति ही सफलता की कुंजी है l
· विरोध करने वाले से भी उसके कर्म को भूल कर प्रेम से मिलो l
· अगर विरोध न हो, रात न हो तो सफलता और दिन का सुख ही न मिले l
· रात को रात की तरह बिताओ, सजग होकर l
· अंहकार मत करो, ब्रहाण्ड में तुम्हारी पृथ्वी भी एक कण की तरह है l
· जैसे रखा जाता है रहो, कूद-फांद मत करो l
· बुरे से बुरे आदमी के कष्ट का निवारण करो l
· तुम जिसका बन चुके हो, उसी के रहो l
· व्रत करना है तो अपने को सभाँल कर रखो l
· तुम्हारे अन्दर मणि है, खोज करो l


· हम कैसे रहें सीखो, उपवास में कम से कम इतना ज्ञान तो होना चाहिये l
· चलते रहना अच्छा है l
· आकाश के नीचे रहना ठीक है l
· कर्त्ता बनने की कोशिश मत करो सब समझ में आ जावेगा l
· काम की शुरूआत और अन्त दोनो ही भला हो तो ठीक है l
· न कुछ लेकर आये थे ओर न कुछ लेकर जायेंगे l
· काम खत्म होने पर ही विश्राम का आनन्द है l
· तुम कल के जिम्मेदार नहीं हो, आज अन्त सोचो l
· कार्यक्रम चलाते रहो, सहयोगी आते रहेंगे l
· सिर्फ इन्तजार करने से मिलना नहीं होता l
· मन में दया भाव रखो, सुखी रहोगे l
· पाप पुण्य के बखेड़े में मत पड़ो, जिस काम के करने में संशय हो या छुप कर करने की जरूरत हो मत करो l
· एक दिन में एक मिनट भी शुन्यता प्राप्त करो l
· कुछ छोड़कर भी विवाद से बचो l
· धन संग्रह करना ठीक है, पर श्रम से चालाकी से नहीं l
· शान्ति के साथ धीरज आवश्यक है l
· कोई धोखा नहीं देता, गलत आशा धोखा है l
· कर्ज लेकर सुखी होना एक भयंकर भूल है l


· कम में रहना सीखो, बच्चे स्वयं सीख जायेंगे l
· तुम जिससे आशा करते हो, उनके पास तुम्हारे लिए समय नहीं है l
· हल्ला करने से आपकी बातें नहीं सुनी जा सकती l
· किसी को गाली देकर उसकी गलती नहीं मनवा सकते l
· दूसरे की गलती भी आपकी गलतीती मानी जा सकती है l
· अनुभवी लोगों की बातें समझनी चाहिए l
· दिन भर में कितना परिवर्तन आपमें होता है सोचिये l
· किसी को सम्मान देने से आप छोटा नहीं होते l
· अपने कर्मो पर विचार नहीं करना बड़ा ही दुःखदायी है l
· जल्दी न करो विश्वास करो दुर्गन्ध दूर हो जावेगा l
· विष देना ठीक है, पर विश्वास देना ठीक नहीं l
· व्यवहार कुशल बनना एक लम्बी प्रक्रिया है l
· अपनाना सीखो छोड़ना नहीं l
· कोई अजनबी नहीं है, उदार बन कर देखो l
· जहाँ जरूरत होगी पहुंच जावोगे l
· स्वस्थ रहने के लिए कुछ भी करना चाहिए l
· लाख दबाव के बाद भी अपने चरित्र व सद्व्यवहार पर कायम रहो l
· अच्छे दिनों की याद से समय का सदुपयोग होता है, विशेष लाभ तो व्यक्तित्व पर निर्भर है l
· दिमाग मिनटों में बदल जाता है, इस पर अभ्यास करो l
· भागने पर ग्रह पीछा करता है, रूकने पर रूक जाता है l
· किसी का पीछा मत करो यह अन्धे करते हैं l
· बहुत नजदीक रहने वाले से भी जीवन की गोपनीय बातें मत बताओ l
· सत्य को जानने वाले से ही सत्य बोलो l
· संकल्प सिद्ध है, संकल्प करो इच्छा नहीं l
· किसी से सहायता की आशा मत करो l
· तन मन से स्वस्थ रहने की कामना करो l
· जो कुछ मिला है, उसके लिए नित्य नमन करो l
· कम बोलना सीखो, सही बोलना आ जावेगा l
· भटको मत कोई स्थान तो अपना बनाओ l
· क्या सोचते हो, चल दो पहुँच जावोगे l
· जहाँ जाना चाहते हो, वहीं देखो, वहीं सोचो वरना भटक जावोगे l
· सोच विचार कर निर्णय, फैसला करो, निर्णय लो तो निबाहो l
· सोचो कि दुनिया में क्या तुम्हारा है, कोन तुम्हारा है l
· सहारा उसका लो जो तुम्हें बेसहारा न बना दे l
· किसी की बुराई न देखो न सुनो l
· बुरे के अच्छे काम में सहयोग करो, उसे सुधरने का अवसर मिल जावेगा l
· किसी से मिलने के पहले अपने पर विचार करो l
· साथ रहकर भी अकेला होना अच्छा है, सीखो l


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यदि महापुरूष समय और काल के अनुकूल विचार व्यक्त करता है तो वह शास्त्र, पुराण अथवा किसी भी धर्म के पवित्र ग्रन्थ से अधिक महत्त्व रखता है l जो देखने में नहीं आता है, अनुमान से ही जिस ईश्वर को देखा है, उस ईश्वर की कोई भाषा नहीं होती l महापुरूषों ने जिन पुरातन ग्रन्थों की रचना की है, उनकी भाषा ईश्वरद्वारा प्रदत्त भाषा हो ही नहीं सकती l जिस काल में, जिस समय में हम हैं, यदि उसी काल और समय के अनुकूल शासक, वैद्ध, गुरू मार्गदर्शन करता है तो सच पूछिये तो सही माने में सिद्ध पुरूष है l इसीलिए जनश्रृति भी वर्तमान समय के महापुरूषों के विचारों को तत्काल अंगीकार करने में रूढ़िता को पीछे छोड़ देती है lजिस तालाब में पानी आने का रास्ता तो हो मगर निकलने का रास्ता न हो, तो वह रूका हुआ पानी स्वभावतः गन्दा हो जाता है l यदि उसमें पानी आने का रास्ता न हो तो उसमें कीचड़ हो सकता है, उदासीनता हो सकती है lयदि उसमें पानी आने का भी रास्ता हो और निकलने का भी रास्ता हो, तो वह अच्छे जीवन का मार्ग देता है l
कोई भी संस्था चाहे राजनीतिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो, यदि मनुष्यों को, प्राणियों को, समय और काल की गति के साथ खुले आकाश और खुली वायु में बिना बोझ के जीना नहीं सिखाती और मानव जाति के लिए अच्छी प्रेरणा का स्त्रोत नहीं बनाती तो वह संस्था अपने-आप में बुझ जाती है, बिला-सी जाती है l उसमें न जाने कितनी विकृतियाँ आ जाती है l
हम बराबर समतल में जीना, रहना, चलना-फिरना चाहते हैं, न कि ऊबड़-खाबड़, गढ़े, नाले में डूबकर मरना चाहते हैं l हमें हरदम कुछ नवीनता चाहिए l वह नबीनतम चाहिए, जो आर्य सत्य को भी न भुला सके l आगन्तुक विचार-धाराओं को भी न अपना सके l
हमारे अपने-आप में जो वास्तविकता उत्पन्न होती है, वह सबके लिए भी कल्याणकारी और अपने लिए भी कल्याणकारी होती है l उसका प्रारम्भ भी कल्याणकारी और अन्त भी कल्याणकारी होता है l वह हमें जीवन का पथ-प्रदर्शन कराती है l

अघोर-दर्शन
· स्पष्टवादी होना ही जरूरी नहीं है, स्पष्ट कार्य भी जरूरी है l
· बुरे की भी बुराई न करना मनुष्यता है l
· अपना विश्वास तथा आत्मबल ही सफलता की जड़ है l
· मनुष्य का कोई भी प्रयास विफल नहीं जाता, प्रयास लगन से करते रहना ही सफलता है l
· अपने सम्मान के प्रयास से घमंड या अभिमान पैदा होता है और आत्मा का प्रकाश क्षीण होने की सम्भावना बनी रहती है l
· बेकार रहने से बुद्धि तथा बल घटता है l
· एकान्तवास जीवन को उच्च तथा शान्तिप्रिय बनाने का सर्वश्रेष्ट उपाय है l

· ईश्वर पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नही है l ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष पर ही प्रसन्न नही होता और न कोई व्यक्ति विशेष ही उसका भक्त है l उस पर तो सबका अधिकार है l वह सब पर प्रसन्न होता है l सभी उसके भक्त हैं l पर ईश्वर से सम्बन्ध बनाने के लिये सबको अपनी आत्मा को स्वच्छ रखना परमावश्यक है l स्वच्छ आत्मा वाला ही परमात्मा को पाने का अधिकारी है l
· ईश्वर गृह-त्याग, तप तथा एकान्त में यातनायुक्त साधना, व्रत, योग इत्यादि रास्ते से ही नही प्राप्त होता l बल्कि गृहस्थ जीवन में रहकर भी बिना किसी साधना के प्राप्त होता है और वह एकमात्र साधना आत्मा की पवित्रता है l
· ब्रह्रा का न रूप है, न रंग l न इसका कोई आकार है न प्रकार l न यह दृश्य है न अदृश्य ही l यदि तुम्हें ब्रह्रा की खोज करनी है तो तुम रूप-रंग, आकार-प्रकार, दृश्य-अदृश्य से मुक्त होकर मन की ही सच्ची उपासना करो l तुम्हें निश्चय ही ब्रह्रा की अनुभूति होगी और तुम स्वयं ब्रह्रामय हो जाओगे l
· जो जीवन के रहस्य को बाहर और भीतर सब तरफ से जान जाता है, वह ईश्वर और ईश्वरत्वं .......दोनों को जान जाता है l
· जहाँ से बुद्धि अपनी थक जाती है, वहाँ उसी के बाद ही, ईश्वर को पाना सुगम हो जाता है l



दंभ, बनावट और विकृति का द्धोतक है l दंभी जीवन वास्तविकता से वंचित कर, दूसरों को ठगने की प्रवृतृति को प्रश्रय देता है l क्या अपने अभ्यन्तर की जटिलता को नख और जटा बढ़ाकर, खाक या लंगोटी लपेट कर और जटिल बना देना चाहते हो ? इसे सुलझाओ सोच कर देखोगे तो तुम्हें, अपने भी इसमें उलझना दंभ ही प्रतीत होगा l दूसरे लोगों की समझ में तो ऐसा है ही l यह विकृति का पूरक है l इसका आश्रय लेना, साधुता कभी भी नहीं हो सकती l यदि वेश, भेषज्ञ, नहीं हुआ, तो दंभ ही कहा जायगा l तुम जानते हो कि राम ने दंभ का तिरस्कार किया था l यह मनुष्य को अपने आप से बिल्कुल अपरिचित बना देता है l दंभ का संचय न कर l यह मूर्खता का आश्रय-स्थल होता है l ‘’
दंभ घमण्ड नहीं है l यह रंगुआ सियार जैसा स्वांग रचना मात्र है l यह अत्यन्त ही वीभत्स है l राधिका के आचरण पर जन-स्वीकृति की मुहर लगवाना, अपकीर्ति का जनक होना, असंयम का श्रोत बनना, विकृति की धरोहर होना l और मदन का पूजन करना---दंभ के सिवा और क्या हो सकता है ?
जो बनता है वह बिगड़ जाता है l तू बिल्कुल न बन l उस स्थिति में बिगड़ने का भय नहीं रहेगा l जैसा कि मैंने कुछ समय पूर्व तुम्हें बतलाया था, दंभ अपने आप से अपरिचित बना देता है l मै यह सुना हुआ नहीं कह रहा हूँ बल्कि यह सब कुछ मेरा देखा हुआ है lदंभ कपट का पोषक है, छल-छिद्र का आश्रय है, जहाँ आत्माराम कभी भी नहीं आते l तू कुछ न बन, सिर्फ मनुष्य बन जा l ब्राह्राण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बन कर विकृति का पोषक न बन l जन-स्वीकृति ने इसकी स्वीकृति नहीं दी है l आज की स्थिति कुछ और ही है,
तुम्हारी तरूणाई कितनी तेजी से पीछे छूटती जा रही है l तुम तीव्र गति से अपरिचित बुढ़ापे की और भागते चले जा रहे हो l दंभ का रथ त्याग कर, निश्चल रथ में जीवन-यात्रा करो ताकि तुम से कोई ठगा न जाय l जरा, तरूणाई और बुढ़ापा से परे हट कर हैl इसकी बिल्कुल संभावना नही है कि जरा की मैत्री हमें अपने आप में कुशल से रहने देगी, बल्कि इसकी संभावना है कि इसकी मैत्री के दुस्सह परिणाम, हमें मार डालेगें l यदि सच कहो तो मैं तुम से कुछ और कहूं l जो कुछ भी तू सूंघ रहा है, स्पर्श कर रहा है, वे घ्राण और त्वचा के विषय हो सकते हैं-----किन्तु ये सभी तेरे प्राण के विषय नहीं हो सकते l इस सत्य की अनदेखी कर, चक्षु, श्रवण, नासिका और त्वचा के विषयों को वास्तविक मान बैठना, अपरिचितता को गौरव देने सरीखे होगा l यह दंभ के अतिरिक्त और कुछ नही है l मन और मनन का विषय प्राणमयी परमेश्वरी नहीं है, यह अदृश्य है, देखा नही जाता l यह वाणी का विषय नहीं है, इसे कहा नहीं जाता l 'कणिका, कणिका, कणिका, कैसा, कैसा, कैसा ! ' सच तो यही है, l
इन्द्रियों के विषयों को विश्वसनीय मानना, कमजोरी----- विकृति के अवशेष को स्वीकार करना है, दंभ को आश्रय देना है l तुम ऐसा रहो, ऐसा करो, ऐसा चलो कि तुम से कोई ठगा न जाय, तुम्हें कोई नाम-रूप के बंधन में बांधे नहीं, तुम्हारी कोई सीमा तय न करे, तुम्हें किसी पदार्थ से न तौले l तुम असीम बनो, अतौल बनो l भले ही तुम्हें कोई ठग ले जाय, किन्तु तुम किसी को न ठगो l ऐसा ही बनो l
हर बनावट पर मचल जाने वाले मनचले लोगों को कोई क्षमा नहीं करता l ऐसे लोगों को अपने आप को अपने आप की ओर से भी क्षमा नहीं होती है l उन्हें निराशा, पस्त-हिम्मती और ग्लानि के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगता है lk मन में कितना आता है, कितना जाता है, कौन आता है, कौन जाता है, इन सभी को झाड़ बहारकर फेंक दो l बुढ़िया आजी की झाडू तुम्हें याद है न ? प्राण को ही अजन्मा, अच्युत, कहते हैं जो सदैव, सर्वकाल में, सर्वत्र पाया जाता है l किन्तु जो भूले हुए हैं, जो दंभी हैं, उनके लिऐ प्राण से मिलन दुर्लभ है l इसकी कतई सम्भावना नहीं है l दंभ ने बड़े-बड़े विद्वानों, पण्डितों, योगियों, साधुओं को भी वास्तविकता से अपरिचित बनाये रखा है l जन्म के आधार पर जाति-पाँति, छूआछूत, का पोषक दंभ ही है l



मै प्रायः देखता हूं कि लोग अपनी दुरवस्था के लिये विषम परिस्थितियों को ही उत्तरदायी ठहराते रहते हैं l अव प्रश्न यह है कि ये परिस्थितियाँ क्योंकर उत्पन्न होती हैं? मनुष्य अपनी दुर्बलता में मनुष्यत्व को ताक पर रखकर ऐसा कुकृत्य कर बैठता है कि वह स्वयं इन विषम परिस्थितियों का जनक बन जाता है l वह स्वयं इसका आवाहन करता है l विपत्ति और मौत, मानवकृत कुकूत्यों के ही परिणाम हो सकते हैं l अच्छे एवं आदर्श आचरण-व्यवहार से किसी प्रकार के अभाव का जन्म नहीं होता, विपत्ति नहीं आती l
गलत आचार-विचार और व्यवहार से मानव रोग-ग्रस्त होता है, शनैः शनैः उसका स्वास्थ्य खराब होने लगता है, वह बिस्तर पकड़ लेता है और अन्ततोगत्वा मौत सिरहाने आकर खड़ी हो जाती है l यह जनश्रृति का कथनहै कि मनुष्य खुद विपत्ति और मौत को आमंत्रण देता है l ऐसा वह अपरिचित परिस्थितियों के कारण नहीं करता है बल्कि परिचित परिस्थितियों में ही वह ऐसा करता है l तुम पूछ सकते हो, कैसे ? 1
मनुष्य जूआ के कुपरिणाम से भलीभांति अवगत होते हुए भी, युधिष्ठिर की जूआ खेलने वाली प्रवृत्ति को अपनाता है, इधर-उधर झगड़ा लगाकर मुकदमेबाजी की लत को प्रश्रय देता है, वेश्यागमन की आदत को प्रोत्साहन देता है l इन सभी दुराचरणों से अर्थ की क्षति तो होती ही है, स्वास्थ्य पर भी इनका कुप्रभाव पड़ता है lअर्थ की क्षति को पूरा करने के लिए ऋण का सहारा लेता है, जब ऋण मिलना वन्द हो जाता है तो ठगी, धोखाधड़ी का आश्रय ग्रहण करता है lजब यह मार्ग भी अवरूद्ध हो जाता है तो उसके सामने भीख मांगने की नोबत आ जाती है l स्वास्थ्य की खराबी से विपत्ति, जरा, मौत की चपेट में फंस जाता है l इसे मनुष्य द्धारा विपत्ति और मौत के आवाहन के सिवा और क्या कहा जा सकता है ?
जनश्रुति भी यही कहती है l शरीर में जो वज्ज्रवत धातु (वीर्य) है, वह स्वस्थ और दीर्घ आयु का जनक है, पोषक है l उसकी उपेक्षा का सहन शरीर नहीं कर सकताउसका अपव्यय, अनादर, होने से शरीर जर्जर, रोग-ग्रस्त हो जाता है l यह अपव्यय, यह निरादर, निश्चित रूप से विपत्ति का ही द्धोतक है l कोई कहे कि मैं असमर्थ हूँ, अनजान हूँ, नहीं जानता----तो ऐसे धैर्यहीन व्यक्ति का साथ धीरज भी नहीं देता l ऐसे व्यक्ति को लोग धिक्कारते हैं l उसे धरकार, बैतुल, भण्ड, दुश्शील, कहकर सम्बोधित करते हैं l

मैं यह नहीं कहता कि शास्त्र-पुराणों में प्रतिपादित पुराने विचारों को ही गौरव दिया जाय l मैं स्त्रियों से भी यह नही कहना चाहता कि वे राधिका के आचरण को आदर्श समझें l पुरूषों के लिए भी, मैं यह नहीं कहना चाहता हूँ कि वे कृष्ण की रासमण्डली की छाया को ही स्वीकार कर लें l मैं तो कहुंगा कि वे बरावर सतर्क रहें, चौकन्ने रहें l कहीं इन ललिताओं, बनिताओं,का निनाद,'तत् तत् थेई थेई' की थिरकन, उनका मोहिनी रूप (मोह नहीं) , नचा तो नही रहा है ? उनके मोहिनी-रूप के जादुई प्रभाव से सदैव सावधान रहें l मैने बच्चों की 'घिरनई' (घिरनी का खेल) देखा था l वह घृणित नहीं था l वह बच्चों के मनोरंजन का साधन था l तू कितने दिनों तक बच्चों का स्वभाव बनाये रखेगा ? उसका त्याग करो l
शब्दों के सही अर्थ को अनर्थ में मत परिवर्तित करो l मनुष्य योनि सबको सदैव नहीं सुलभ होती l मैने योगी जनों को भी कहते सुना है कि मानव-जीवन के लिए देवता भी तरसते रहते हैं l तुझे परिस्थितियों से बड़ा भय है क्या ?निर्भय बन नीरव बन भय का अवशेष भी निश्शेष हो जाए l परिस्थिति परायी की स्थिति को कहते हैं, अपरिचित स्थिति को कहते है l जहाँ परिचित स्थिति होगी, वहाँ अपने को अपरिचित-असहाय समझना, स्वयं को धोखा देने से कम थोड़े है l ऐसा ही समझना होगा l तब, सुने सरीखे नहीं, देखे सरीखे मालुम होगा l